You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भगवंत मान का एक साल: कहां मिली कामयाबी और कहां हुई चूक
- Author, अरविंद छाबड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पिछले साल 16 मार्च को भगवंत मान ने मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली तो उन्होंने वादा किया था कि अब एक अलग सरकार देखने को मिलेगी जो आम लोगों की सरकार होगी.
एक साल में सरकार ने कई अहम फ़ैसले लिए जिससे काफ़ी लोग खुश हुए और कई मुद्दों को लेकर उसे काफी आलोचना का भी सामना करना पड़ा.
चलिए सबसे पहले बात उन पांच मुद्दों की करते हैं जो आम आदमी पार्टी के चुनावी मुद्दों में सर्वोपरि थे और यहां कि जनता पर इसका असर भी देखने को मिला है.
1. ज़ीरो बिजली का बिल
बीते एक साल में जिस एक चुनावी वादे का असर लगभग हर घर पर दिखा वो है बिजली का बिल.
पंजाब वो राज्य हैं जहाँ सालों से लोगों को बिजली की कमी के साथ-साथ महँगी बिजली भी मिलती रही है.
यहाँ तक कि पंजाब से सटे चंडीगढ़ से भी बिजली महंगी मिलती रही है.
आम आदमी पार्टी ने लोगों की इस बिजली के दर्द को चुनाव से पहले ही पढ़ लिया था और फ़्री बिजली उनके चुनावी वादे की सूची में सबसे ऊपर थी.
सरकार ने 1 जुलाई से प्रति माह 300 यूनिट मुफ़्त बिजली देने की गारंटी को पूरा किया है.
यही वजह है कि पिछले एक साल में यहां के लगभग हर घर के बिजली के बिल में कमी आई है.
मुख्यमंत्री भगवंत मान कहते हैं कि नवंबर-दिसंबर 2022 में राज्य के 87 प्रतिशत लोगों के ज़ीरो बिल आए थे.
वे कहते हैं कि वह एक आम परिवार से हैं और आम लोगों की बिजली की परेशानियों से अच्छे से वाकिफ हैं.
जहाँ आम लोग इससे काफी खुश नज़र आते हैं वहीं जानकारों का मानना है कि पहले ही कर्ज़ में डूबे राज्य पर इसका अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
2. ज़ीरो भ्रष्टाचार
ज़ीरो बिजली के बिल की तरह पंजाब सरकार एक अन्य जगह भी ज़ीरो को बड़े ज़ोर शोर से बखान करती है.
ये है ज़ीरो भ्रष्टाचार.
मुख्यमंत्री भगवंत मान अक्सर कहते हैं कि राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है.
वे कहते हैं कि राज्य को बेरहमी से लूटने और बर्बाद करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता.
आए दिन ऐसी ख़बरें आती रहती हैं कि किसी न किसी पूर्व मंत्री को विजिलेंस की ओर से या तो बुलावा भेजा गया है या फिर गिरफ़्तार किया गया है.
पिछले ही दिनों कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी के ख़िलाफ़ लुक आउट सर्कुलर (ऐलओसी) जारी किया गया है.
पिछली सरकार में मंत्री रहे साधू सिंह धर्मसोट, शाम सुंदर अरोड़ा और भरत भूषण आशु पहले ही गिरफ़्तार किए जा चुके हैं.
3. मोहल्ला क्लीनिक
पिछले एक साल में राज्य भर में 504 आम आदमी क्लीनिक या मोहल्ला क्लीनिक खोले गए हैं.
सरकार का दावा है कि वे सेहत और शिक्षा को ख़ास महत्व दे रही है.
इन क्लीनिक पर विशेषज्ञ चिकित्सक अपनी सेवाएं देते हैं.
यहाँ ओपीडी सेवाएं, टीकाकरण सेवाएं, प्रसूति सेवाएं, परिवार नियोजन सेवाएं, लैब जांच आदि की नि:शुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई है और दवाएं भी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाती है.
सरकार का कहना है कि ये क्लीनिक आम लोगों के लिए बड़ी राहत साबित होंगे और अब लोगों को विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं उनके घर के बेहद क़रीब मिल सकेंगी.
इसे लेकर विवाद भी सामने आया जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने लोकसभा में दावा किया कि पंजाब सरकार ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के फंड का उपयोग करके अपने राज्य में मोहल्ला क्लीनिक बनाए हैं.
उन्होंने कहा कि इस संबंध में उन्होंने पंजाब सरकार को पत्र भी लिखा है.
विपक्षी पार्टियों ने भी सरकार पर आरोप लगाए कि पंजाब सरकार के इस क़दम से पहले से मौजूद हेल्थ सेंटर्स पर असर पड़ रहा है क्योंकि वहाँ से स्टाफ़ इन मोहल्ला क्लीनिक में भेजे जा रहे हैं.
ये भी पढ़ें:मणिकरण साहिब: पर्यटकों और स्थानीय लोगों में झगड़ा, वायरल वीडियो के बाद प्रशासन का आश्वासन
4. रोज़गार और पक्की नौकरी
पंजाब सरकार के मुताबिक़ बेरोज़गारी से जूझ रहे पंजाब में नौकरियाँ एक बड़ी राहत बन के आई हैं.
मुख्यमंत्री भगवंत मान के अनुसार, बीते वर्ष 26,000 से अधिक नौकरियां दी गई हैं और ये पूरी तरह से योग्यता के आधार पर और पूरी तरह से खुली भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से दी गई हैं.
उनका कहना है कि ये सिर्फ़ शुरुआत है और आने वाले दिनों में और भी नौकरियां दी जाएंगी.
बेरोज़गारी के अलावा पंजाब में बीते सालों में उन लोगों ने भी काफ़ी धरने प्रदर्शन किए जो अपनी कांट्रैक्ट और अनियमित नौकरियों को नियमित किए जाने की माँग कर रहे थे.
पिछले महीने, पंजाब कैबिनेट ने राज्य के विभिन्न विभागों में काम कर रहे 14,417 कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करने के राज्य सरकार के फ़ैसले को अपनी मंजूरी दे दी थी.
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि यह शिक्षा विभाग के पूर्व में नियमित किए गए 14 हज़ार कर्मचारियों के अतिरिक्त है.
5. 'मूंग' पर एमएसपी
आम आदमी पार्टी सरकार ने गेहूं-चावल के चक्र को तोड़ने और किसानों को विकल्प देने की दिशा में संकेत देते हुए 'मूंग' पर एमएसपी देने की योजना का एलान किया.
सरकार का इरादा था कि इससे किसानों को इसकी खेती के लिए प्रेरित किया जाए.
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार राज्य में फ़सल विविधिकरण को बड़े स्तर पर बढ़ावा दे रही है और उन्होंने वैकल्पिक फ़सलों के विपणन का मामला भारत सरकार के समक्ष भी उठाया है.
विपक्षी पार्टियों ने सरकार को यह कह कर आड़े हाथों लिया कि सरकार मंडियों में आने वाली फ़सल की ख़रीद में आनाकानी करती पाई गई.
उन्होंने कहा कि फ़सल का केवल 10 फ़ीसद ख़रीदा गया था और अधिकांश किसानों को एमएसपी से काफ़ी कम कीमतों पर मजबूरी में अपनी फ़सलें बिक्री करनी पड़ी.
अब बात करते हैं उन मुद्दों की जिनके वादे तो आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पहले किए थे.
भगवंत मान को मुख्यमंत्री बने एक साल हो गए हैं लेकिन इन पांच अहम मुद्दों पर अब तक उनकी सरकार कमोबेश नाकाम ही दिख रही है.
लिहाजा इसे लेकर राज्य सरकार की कड़ी आलोचना हो रही है.
1. अपराध
23 फ़रवरी को अजनाला में जो हुआ वो देश भर में सब ने देखा. खालिस्तान समर्थक 'वारिस पंजाब दे' के प्रमुख अमृतपाल सिंह बड़ी गिनती में अपने समर्थकों के साथ अपने साथी को रिहा कराने के इरादे से थाने के अंदर पहुँच गए.
पुलिस को अंतत उन्हें रिहा तो करना ही पड़ा और साथ ही किसी पर कोई क़ानूनी कार्रवाई भी नहीं की गई है.
सरकार को इस मामले में कार्रवाई न करने पर लगातार आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
दरअसल यह पहला मौका नहीं है कि चरमपंथियों की वजह से सरकार आलोचना में घिरी है.
जनवरी से ही कौमी इंसाफ़ मोर्चा के नाम पर सिख कैदियों की रिहाई को लेकर मोहाली में सैकड़ों लोग धरने पर बैठे हैं.
आठ फ़रवरी को उस वक़्त कई पुलिस वाले जख़्मी हुए जब उन्होंने पुलिस वालों के ऊपर कथित तौर पर हमला कर दिया.
पुलिस ने कई लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा तो दर्ज किया लेकिन किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया.
इनके अलावा कई और सनसनीखेज वारदातें भी हुई हैं.
अभी भगवंत मान सरकार को सत्ता में आए तीन महीने भी नहीं हुए थे जब मशहूर गायक शुभदीप सिंह सिद्धू, जो सिद्धू मूसेवाला के नाम से जाने जाते हैं, उनका दिन दहाड़े गोलियाँ मार के कत्ल कर दिया गया.
मामले में कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया लेकिन मूसेवाला के अभिभावकों का कहना है कि उन्हें इंसाफ़ नहीं मिला क्योंकि "कत्ल के पीछे जो बड़े नाम" हैं उन्हें नहीं पकड़ा गया है.
फिर फ़रीदकोट के कोटकपूरा में तीन बाइक पर सवार 6 लोगों ने डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी प्रदीप सिंह को गोलियों से भून डाला.
इसी तरह नकोदर शहर में एक अन्य घटना में दिसंबर के महीने में 39 वर्षीय व्यापारी को गोली मार कर हत्या कर दी गई. उनके गनमैन को भी इसी घटना में मार दिया गया.
गैंगस्टर्स और उनकी गतिविधियाँ काफ़ी देखने को मिलीं.
ज़ाहिर है राज्य की क़ानून व्यवस्था को लेकर विपक्षी पार्टियों ने सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा.
पर भगवंत मान ने सदन में कहा कि इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने की जगह कांग्रेस और भाजपा नेताओं को अपनी सरकारों वाले राज्यों के तथ्यों के बारे पता होना चाहिए कि वह क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे पर पंजाब से कहीं नीचे हैं.
2. मर्यादा का मुद्दा
पंजाब के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच काफ़ी नोकझोंक चलती आ रही है.
राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने 13 फ़रवरी को राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत मान को औपचारिक पत्र लिखकर कई मुद्दों पर जवाब मांगा था.
इस दौरान राज्यपाल ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री उनके पत्रों का जवाब नहीं देते हैं और अगर 15 दिनों के भीतर इस पत्र का जवाब नहीं दिया गया तो क़ानूनी सलाह ली जाएगी.
राज्यपाल का पत्र मीडिया में आने के बाद मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर जवाब दिया कि वह राज्यपाल के प्रति नहीं बल्कि पंजाब के लोगों के प्रति जवाबदेह हैं.
पंजाब सरकार ने बजट सत्र बुलाने का फ़ैसला किया, लेकिन राज्यपाल ने सत्र को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
इसको लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. कोर्ट ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को संवैधानिक मानदंडों को बनाए रखने की सलाह दी.
3. दिल्ली से सरकार
शुरू से ही पंजाब सरकार पर विरोधी दल यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि भगवंत मान नहीं बल्कि दिल्ली से सरकार चलाई जा रही है.
सरकार को अभी बने कुछ ही दिन हुए थे जब भगवंत मान पर निशाना साधते हुए विरोधी दलों ने कहा कि पंजाब सरकार को अरविंद केजरीवाल चला रहे हैं.
ये भी आरोप लगाया गया कि केजरीवाल ने सीधे पंजाब के अफ़सरों के साथ मीटिंग करना शुरू कर दिया है.
फिर जब दिल्ली-पंजाब नॉलेज शेयरिंग अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए तब फिर विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की आलोचना की.
विपक्ष ने भगवंत मान पर अपने अधिकार का समर्पण करने और सीमावर्ती राज्य में हस्तक्षेप को संस्थागत बनाने का आरोप लगाया.
आज तक भी भगवंत मान विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष के इसी तरह से निशाना बनते आए हैं.
4. बदले की राजनीति
जहाँ एक ओर पंजाब सरकार का दावा है कि वे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई कर रही है वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार बदले की राजनीति कर रही है.
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा ने तो सदन में यह भी कह दिया कि विजिलेंस के दफ़्तर के बाहर पार्टी को अपने झंडे लगा लेने चाहिए.
कुछ महीने पहले कांग्रेस ने मोहाली में विजिलेंस के मुख्यालय में जा कर विरोध प्रदर्शन भी किया था.
5. इंतज़ार करतीं महिलाएँ और आर्थिक चिंता
चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने महिलाओं को 1000 रुपये प्रति माह दिए जाने की बड़ी गारंटी भी दी थी. लेकिन जब इस बार के बजट में भी यह नहीं आया तो कांग्रेस नेता अमरिंदर राजा वारिंग समेत कई नेताओं ने सरकार को घेरा.
वहीं, जानकारों का मानना है कि सरकार की मुफ़्त देने की राजनीति का अतिरिक्त बोझ राज्य पर पड़ेगा और वैसे ही पंजाब पर लगभग तीन लाख करोड़ का कर्ज़ है.
आर्थिक विशेषज्ञ रंजीत सिंह घुमन का कहना है कि पंजाब सरकार सही रास्ते पर चलती नहीं दिख रही है.
वे कहते हैं, "पिछले साल 98 हज़ार करोड़ की आमदनी होनी थी लेकिन 78 हज़ार करोड़ ही आई. इस साल 95 हज़ार करोड़ आने चाहिए थे लेकिन अभी तक 60 हज़ार करोड़ ही आए हैं."
घुमन बताते हैं कि, "15,000 करोड़ रुपये जो जीएसटी मुआवजे के रूप में आने वाले थे, अब नहीं आए हैं."
उनका ये भी कहना है कि, "इन सब के इलावा सब्सिडी या फ़्रीबीज़ का अतिरिक्त बोझ राज्य सरकार को उठाना पड़ेगा. अब तक जो दिख रहा है वह एक ख़तरनाक रुझान है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)