गेम, मैच और सेट अन्ना को

अन्ना समर्थक

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली.

आज के भारत में जब ईमानदारी के प्रतिरूपों की चर्चा होती है तो मनमोहन सिंह और अन्ना हज़ारे का नाम सहज ही ज़ुबान पर आता है.

इसके बावजूद कि हाल के दिनों में मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के कई सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोपों में उँगलियाँ उठी हैं और कांग्रेस के एक प्रवक्ता अन्ना हज़ारे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके हैं.

15 अगस्त को ये दोनों हस्तियाँ अलग-अलग समय और मंचों पर भारत के लोगों से रूबरू थीं. लाल किले की प्राचीर से मूसलाधार बारिश के बीच मनमोहन सिंह कई घोटालों की शिकार अपनी सरकार का बचाव कर रहे थे तो शाम को राजघाट की हरी दूब पर चादर बिछा कर अपने प्रशंसकों से घिरे आँखें मूँदे अन्ना हज़ारे गहन चिंतन की मुद्रा में बैठे थे.

यह जानने के लिए किसी मशक्कत की ज़रूरत नहीं थी कि इनमें से कौन भारत की जनता से सीधा संवाद स्थापित करने में सफल हो पा रहा था.

हज़ारे सरल आदमी हैं. साफ़ और खरा बोलते हैं. फिर भी उन्हें भड़काऊ भाषण देने वाले करिश्माई नेताओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

दूसरी तरफ़ मनमोहन सिंह की छवि भी क़रीब-क़रीब अन्ना हज़ारे की छवि से मेल खाती है. साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला विनम्र और सीधा व्यक्ति.

ज़ोर-आज़माइश

हज़ारे की तरह मनमोहन में भी न तो कोई करिश्मा है और न ही लोगों को मंत्रमुग्ध कर पाने की क्षमता. यह दोनों ही स्टीरियो टाइप नेताओं की छवि पर खरे नहीं उतरते.

लेकिन वक़्त की बात है कि आज ये दोनों ऐसे-ऐसे पक्षों का नेतृत्व कर रहे हैं जो कई मुद्दों पर एक-दूसरे की ज़ोर-आज़माइश करने में लगे हुए हैं.

वर्ष 2000 तक कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक दिन मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री होंगे और अन्ना हज़ारे उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंदी!

यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी को इस बात से ख़ासा सुकून मिल रहा था और है कि एक अच्छा आदमी उनका नेतृत्व कर रहा है.

अंदाज़ा

मनमोहन सिंह और अन्ना हज़ारे

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इमेज कैप्शन, मनमोहन सिंह और अन्ना हज़ारे आमने-सामने हैं

इससे उनको एक तरह की वैधता भी मिल रही थी और उनकी नैतिक ठसक भी बढ़ रही थी.

लेकिन उन्हें इसका अंदाज़ा भी नहीं था कि एक और साधारण और बूढ़ा इंसान न सिर्फ़ ईमानदारी के मुद्दे पर मनमोहन सिंह को बराबर की टक्कर दे रहा था बल्कि हमेशा से बेपरवाह रहने वाले और मीन मेख निकालने वाले मध्य वर्ग को भी अपनी तरफ़ कर रहा था.

यूपीए सरकार ने इस बात पर जुआ खेला था कि अन्ना को गिरफ़्तार कर रामदेव की तरह उनको भी आप्रासंगिक करा पाने में वह सफल हो पाएंगे.

रणनीति यह थी कि इस शख़्स को केंद्र बिंदु से हटाइए, कुछ दिनों तक नज़रों से ओझल रखिए और देश अपने-आप बार-बार चैनल बदलने के अंदाज़ में वापस चला जाएगा.

लेकिन हुआ ठीक इसका उलटा ही. ऐसा इसलिए हो पाया है क्योंकि अन्ना का कोई अपना निजी एजेंडा नहीं है. वह किसी पद की तलाश में नहीं हैं.

चुनावी राजनीति से भी उनका दूर-दूर का वास्ता नहीं है. ऐसे समय पर जब-जब गाँधी टोपी लालची राजनेताओं का प्रतीक बनती जा रही थी, उन्होंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा कर टोपी में चरक वापस लाने की कोशिश की है.