खंडूरी पर दांव, क्या पार होगी नाव?

खंडूरी

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इमेज कैप्शन, खंडूरी के लिए चुनाव में पार्टी को जितवाना आसान नहीं है
    • Author, शालिनी जोशी
    • पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

'खंडूरी हैं ज़रूरी'- उत्तराखंड में सरकार में वापसी के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही भाजपा का सबसे बड़ा नारा यही है.

करोड़ों की लागत से पूरे राज्य में लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स यही कह रहे हैं-'खंडूरी जरूरी हैं'. कथित रूप से महंगाई से निजात दिलाने के लिए, भ्रष्टाचार मुक्त जवाबदेह शासन के लिए, पहाड़ से पलायन रोकने के लिए, फ़ौजियों के कल्याण के लिए और सस्ता राशन मुहैया कराने के लिए भी.

दूसरे शब्दों में कहें, तो भाजपा शायद ये भी मानती है कि खंडूरी ज़रूरी हैं, पार्टी को जिताने के लिए. उत्तराखंड की चुनावी रेस में पार्टी ने सारा दांव खंडूरी पर ही लगाया है और पार्टी के दूसरे नेता पार्टी के एजेंडे और प्रचार सामग्री से नदारद हैं.

पार्टी ने खंडूरी को ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया है. इस बारे में खंडूरी ख़ुद कहते हैं, "अगर पार्टी ने ये रणनीति बनाई है तो कुछ सोच-समझकर ही बनाई होगी."

वहीं कांग्रेस और दूसरे विरोधी दलों का सवाल ये है कि अगर खंडूरी इतने ही ज़रूरी थे तो आख़िरकार उन्हें हटाया ही क्यों गया था.

जीत

उत्तराखंड की राजनीति के पुराने पन्ने पलटें, तो 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत हासिल हुई थी. मुख्यमंत्री पद के लिए भारी खींचतान और विरोध के बीच खंडूरी मुख्यमंत्री बनाए गए. लेकिन निशंक और कोश्यारी गुट ने हथियार नहीं डाले.

वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस ने राज्य की पांचों ही सीटों पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया और भाजपा को मुंह की खानी पड़ी तो खंडूरी के ख़िलाफ़ रही लॉबी को हाथों-हाथ मुद्दा मिल गया.

खंडूरी को इस्तीफ़ा देना पड़ा और निशंक की ताजपोशी हुई. लेकिन फ़ौजी रहे जनरल खंडूरी ने भी मैदान नहीं छोड़ा और उन्होंने निशंक के समांतर राज्य में अभियान छेड़ दिया.

इधर निशंक के कार्यकाल में कथित भ्रष्टाचार के इतने मामले आए कि अपनी ही सरकार का बचाव करना भाजपा के लिए मुश्किल हो गया. चाहे बिजली परियोजनाओं के आबंटन का मामला हो, हरिद्वार महाकुंभ में करोड़ों रूपए की अनियमितता के आरोप और इस बारे में सीएजी की रिपोर्ट हो या कंपनी विशेष को फ़ायदा पंहुचाने का मामला हो.

इस बीच अगले चुनाव भी क़रीब आने लगे और भाजपा ने आंतरिक सर्वेक्षण कराया, जिसमें ये पाया गया कि राज्य में एंटी इनकम्बेंसी फ़ैक्टर सक्रिय है और पार्टी मुश्किल से 10 सीटें भी नहीं जीत पाएगी.

कामयाबी

सत्ता में वापसी के लिए बेकरार खंडूरी ने इस अवसर को लपक लिया. वो निशंक को हटाने में कामयाब रहे और पार्टी आलाकमान ने भी एक तरह से अपनी 'भूल सुधार' करते हुए सत्ता दोबारा खंडूरी को सौंप दी.

क्या ये दाँव चलेगा?

अगर इतिहास देखें, तो भाजपा के लिए अनुकूल संकेत नहीं है. क्योंकि यही प्रयोग भाजपा 2002 के चुनावों में भी कर चुकी है, जब चुनाव से ठीक तीन महीने पहले नित्यानंद स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया था. लेकिन सत्ता विरोधी लहर जारी रही और भाजपा हार से बच नहीं पाई.

खंडूरी की राजनैतिक और कूटनीतिक सफलता है कि उन्होंने अपनी छवि कमोबेश ईमानदार और कठोर प्रशासक की बनाई ज़रूर है, लेकिन ये देखने लायक़ बात होगी कि वोट डालते समय मतदाता सिर्फ़ इस छवि को ध्यान में रखेंगे या भाजपा के पूरे पाँच साल के कार्यकाल को तौलेंगे, जिसमें अधिकांश समय कुर्सी की खींचतान में ही बीता.

विकास

निशंक
इमेज कैप्शन, सवाल ये भी है कि क्या निशंक और कोश्यारी का गुट खंडूरी का जी-जान से समर्थन करेगा?

कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करने देहरादून आए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भाजपा पर सवाल दागा कि उसे बताना होगा कि बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की नौबत क्यों आती रही. क्या उसने ये नहीं सोचा कि इससे विकास बाधित हुआ.

वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत कहते हैं, "बंद मुठ्ठी लाख की और खोल दो तो खाक की. भाजपा ने मुठ्ठी खोलकर समझदारी का काम नहीं किया है. कांग्रेस में तो मुख्यमंत्री पद का कोई घोषित प्रत्याशी नहीं, इसलिए वहां जीत के लिए सभी मेहनत करेंगे. लेकिन भाजपा में खंडूरी के जो प्रतिद्वंद्वी हैं, निशंक और कोश्यारी, वो आख़िर खंडूरीजी को जिताने के लिये क्यों मेहनत करेंगे."

इन गुटों के अतिरिक्त पार्टी में युवा नेताओं के एक बड़े वर्ग में 77 साल के खंडूरी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से मायूसी भी है.

उनका मानना है कि निशंक को हटाने की बजाय पार्टी को एकजुट होकर विपक्ष के हमलों का जवाब देना चाहिए था.