इमरान ख़ान यौन अपराधों पर विवादित बयान क्यों देते हैं?

    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ इस्लामाबाद
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

"...हमारे क़ानून और हमारे धर्म में ये स्पष्ट है कि महिलाओं का सम्मान करना देखने वाले की ज़िम्मेदारी है, किसी भी पुरुष को ये अधिकार नहीं है कि महिलाओं और उनके पहनावे को उनके ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा, बलात्कार और अपराधों के लिए ज़िम्मेदार ठहराए…"

"नाबालिग़ों, महिलाओं, बच्चियों और लाशों तक का बलात्कार किया जा रहा है, किस तरह के प्रधानमंत्री शिकारियों की वकालत कर सकते हैं"?

ये शब्द उन महिलाओं के हैं जो पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बयान पर अपना रोष प्रकट कर रही है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अमेरिकी टीवी चैनल एचबीओ के एग्जिओस कार्यक्रम को दिए एक हालिया इंटरव्यू में महिलाओं के पहनावे, बलात्कार और प्रलोभन से जुड़ा बयान दिया है. इन बयानों पर प्रधानमंत्री को सिविल सोसाइटी और महिला नेताओं की ओर से तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

हालांकि, कुछ लोग इमरान ख़ान के तर्कों का समर्थन भी कर रहे हैं. लोग इसे इस्लाम की सही व्याख्या करार दे रहे हैं और अमेरिकी टीवी चैनल पर प्रधानमंत्री के बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं.

इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखी है. लेकिन यौन अपराधों को प्रलोभन और महिलाओं के पहनावे से जोड़ने वाले उनके बयान की हर जगह चर्चा हो रही है.

ट्विटर पर #RapeApologistSelectedPM, #अश्लीलता ख़त्म करें समाज बचाएं, #KhanWonTheHearts जैसे हैशटैग इस्तेमाल करके लोगों ने प्रधानमंत्री के बयान पर अपनी राय दे कर रहे हैं.

कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने उन्हें "रेप अपॉलिजिस्ट (वो शख़्स जो रेप के आरोपी के अपराध की जानकारी रखते हुए उसका बचाव करे) और महिला विरोधी" जैसी भी संज्ञाएं दी हैं.

आख़िर क्या बोले इमरान ख़ान?

इंटरव्यू के दौरान पत्रकार जोनाथन स्वान ने ख़ान से पूछा कि उनके एक बयान को इस तरह पेश किया गया है जिसमें वह कह रहे हैं कि महिलाओं द्वारा नक़ाब पहनने की प्रथा का उद्देश्य प्रलोभन को रोकना है.

इस पर ख़ान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मैंने कभी भी वेल्स (नक़ाब) पर बात नहीं की. मैंने पर्दे के विचार पर बात करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य प्रलोभन को समाज से दूर रखना है. हमारे यहां न ही डिस्को हैं और न ही नाइट क्लब हैं. यह बिलकुल अलग समाज है जहां पर जीने का अलग तरीक़ा है. अगर आप यहां पर प्रलोभन बढ़ाएंगे और युवाओं को कहीं जाने का मौक़ा नहीं होगा तो इसके कुछ न कुछ परिणाम होंगे."

इसके बाद स्वान ने पूछा कि क्या उनके विचार में महिलाओं के पहनावे का कोई असर होता है, क्या ये प्रलोभन का एक अंग है.

इस पर इमरान ख़ान ने कहा, "अगर कोई महिला बेहद कम कपड़े पहने होगी तो इसका असर पुरुषों पर होगा जब तक कि वे रोबोट न हों. मेरे हिसाब से ये एक सामान्य समझ है."

ये पहला मौक़ा नहीं है जब इमरान ख़ान के यौन हिंसा और महिलाओं की आबरू से जुड़े बयान विवाद का विषय बने हों.

साल की शुरुआत में इमरान ख़ान ने एक लाइव कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान में बलात्कार और यौन हिंसा के बढ़ते मामलों के लिए अश्लीलता को ज़िम्मेदार ठहराया था. इसके बाद उन्हें महिला अधिकारों की पैरवी करने वालों की आलोचना का सामना करना पड़ा था.

इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि इस्लाम में पर्दा का पूरा विचार ही इस बात पर टिका है कि इससे समाज में प्रलोभन को रोका जा सकता है.

इसके बाद इमरान ख़ान पर पीड़ितों को ही दोषी ठहराने और महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन हिंसा की ज़िम्मेदारी उन पर डालने और बलात्कारियों को उनकी ज़िम्मेदारी से मुक्त करने का आरोप लगाया गया.

सोशल मीडिया पर तीखा विरोध

इस विवाद पर सत्ताधारी दल पीटीआई से जुड़ी महिला नेताओं ने चुप्पी साधी हुई है. लेकिन अन्य राजनीतिक दलों से जुड़ी महिला सांसदों ने इस मुद्दे पर ख़ान की कड़ी आलोचना की है.

पूर्व सूचना मंत्री सीनेटर शैरी रहमान ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, "...हमारे क़ानून और हमारे धर्म में ये स्पष्ट है कि महिलाओं का सम्मान करना देखने वाले की ज़िम्मेदारी है, किसी भी पुरुष को ये अधिकार नहीं है कि महिलाओं एवं उनके पहनावे को उनके ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा, बलात्कार और अपराधों के लिए ज़िम्मेदार ठहराए. मैं काफ़ी हैरान हूं कि हमारे प्रधानमंत्री ये कर रहे हैं."

पाकिस्तान मुस्लिम लीग की प्रवक्ता नवाज़ मरियम औरंगजेब ने कहा है, "दुनिया को आज एक बीमार, महिला विरोधी, पतित, और डेरेलिक्ट इमरान ख़ान के ज़हन में झांकने का मौका मिला है. ये महिलाओं की च्वॉइस नहीं है जिसकी वजह से यौन अपराध होते हैं. ये पुरुषों के फैसले हैं जो इन घिनौने अपराधों को करने के लिए तैयार होते हैं."

टेलीविज़न कार्यक्रम "ऑन द फ्रंटलाइन विद कामरान शाहिद" पर बात करते हुए सीनेटर पलवाशा ख़ान ने कहा है कि ये बयान एक बीमार सोच को दर्शाता है.

वह कहती हैं, "मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं है कि पीएम इस तरह के बयान क्यों दे रहे हैं. दुर्भाग्य से वह ये नहीं समझते हैं कि वह इस मुल्क की सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे हैं और वह जो भी कहते हैं, वह पूरी दुनिया में सुना जाता है."

उन्होंने ये भी कहा कि "नाबालिग़ों, महिलाओं, बच्चियों और लाशों तक का बलात्कार किया जा रहा है, किस तरह के प्रधानमंत्री शिकारियों की वकालत कर सकते हैं"?

महिला अधिकारों के पक्षधरों, वकीलों और पत्रकारों ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर अपना विरोध जताया है. इस मुद्दे पर भी बात की गई कि बलात्कार को एक हिंसक अपराध की तरह देखे जाने की अपेक्षा वासना की वजह से होने वाले अपराध के रूप में देखे जाने के क्या परिणाम हो सकते हैं.

वकील रीमा ओमर कहती हैं, "आज ट्विटर पर पुरुष पीएम के इंटरव्यू की आलोचना करने वाली महिलाओं को 'सज़ा' देने के लिए बलात्कार करने की धमकी दे रहे थे हैं. और 'उन्हें सबक सिखाने' की बात कर रहे हैं. इसके साथ वह ये भी तर्क दे रहे हैं कि पुरुष अपनी यौन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बलात्कार करते हैं. इस बिडंबना को कोई कैसे अनदेखा कर सकता है."

पत्रकार मारियाना बाबर ने एक हास्य वेबसाइट की न्यूज़क्लिप को साझा किया जिसमें दिखाया गया कि किस तरह एक ऑटोमेटेड एंटी-रेप ड्राइव के तहत मदरसों में मौलवियों को रोबोट्स से बदल दिया गया है.

वह एक हालिया मामले का ज़िक्र कर रही थीं जहां एक मौलवी को अपने किशोर छात्र (लड़के) का शोषण करने के लिए गिरफ़्तार किया गया है.

वहीं आलिया चुगताई ने लिखा है, "पाकिस्तान में यौन जबरदस्ती के मामले में मृत महिलाओं को भी नहीं बख़्शा जाता. ऐसे में ज़िंदा औरतों के पास क्या विकल्प हैं जब देश का प्रधानमंत्री ये कहता हो कि समस्या महिलाओं के कपड़ों से जुड़ी हुई है?"

इस मामले में ज़्यादातर टिप्पणियां महिलाओं की ओर से आई हैं लेकिन पुरुषों की ओर से भी इमरान ख़ान को आड़े हाथों लिया गया है.

पत्रकार मुबाशिर ज़ैदी लिखते हैं कि इमरान ख़ान को ट्विटर पर पाकिस्तान महिलाओं के बीते दर्दनाक अनुभव पढ़ने चाहिए और उनके जख़्म कुरेदने के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए.

मिर्ज़ा नामक एक ट्विटर यूज़र लिखते हैं, "वो देश जहां जानवर भी आदमियों से सुरक्षित नहीं हैं. वहां इमरान ख़ान महिलाओं और उनके कपड़ों पर दोष मढ़ रहे हैं."

लेकिन इस बयान का विरोध विशेष रूप से पाकिस्तान के उदारवादी तबके में देखा जा रहा है. मुख्यधारा के चैनल और उर्दू प्रेस ने अपने आपको इस विचार-विमर्श से दूर रखा है.

सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कई लोग सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बयान का समर्थन करते हुए नज़र आ रहे हैं.

ये लोग इमरान ख़ान का इस बात पर भी समर्थन कर रहे हैं कि क़ुरान और पैगंबर मुहम्मद ने पर्दा को सही ठहराया था ऐसे में जो इमरान ख़ान के बयान का विरोध कर रहे हैं, वे इस्लाम की मूल शिक्षाओं का खंडन कर रहे हैं.

कुछ लोगों ने इमरान ख़ान की इस बात को लेकर भी तारीफ़ की कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने मन की बात रखने का साहस रखते हैं.

सीनियर एनालिस्ट मुजीब उर रहमान शमी ने पर्दा प्रथा पर इमरान का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को इस तरह के विवाद में फंसने से बचना चाहिए. उन्होंने कहा है कि देश की सांस्कृतिक और धार्मिक दिशानिर्देश इस मामले में स्पष्ट हैं, प्रधानमंत्री द्वारा इस तरह के बयान बिना वजह के विवाद को जन्म देते हैं.

कुछ लोगों ने सीबीएस पर प्रधानमंत्री के बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से उनके बयान का नौ मिनट लंबा वीडियो क्लिप जारी किया गया है जिससे उनका असली विचार सबके सामने आ सके. लेकिन ट्विटर यूज़र्स ने कहा है कि इससे भी उन्हें कम बुरा नहीं लगा है.

पत्रकार जोनाथन स्वान ने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इंटरव्यू की क्लिप जारी करने को एक "अजीब रणनीति" बताया है.

सार्वजनिक फाँसी वाले बयान?

इमरान खान ने पिछले साल बलात्कारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने और कैमिकल कैस्ट्रेशन करने की बात कहकर एक विवाद को जन्म दिया था. ख़ान ने यह बयान तब दिया था जब लाहौर के पास एक सड़क पर महिला की गाड़ी में ईंधन ख़त्म होने के बाद महिला के साथ उसके बच्चों के सामने बलात्कार किया गया था.

इमरान ख़ान ने कहा था, "जिस तरह हत्याओं को पहली डिग्री, दूसरी डिग्री और तीसरी डिग्री के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, बलात्कार को भी इस तरह से वर्गीकृत किया जाना चाहिए, और पहली श्रेणी के बलात्कारियों को पूरी तरह से कैस्ट्रेटेड करना और किसी लायक नहीं छोड़ना चाहिए."

साल 2020 के दिसंबर महीने में पाकिस्तान ने एक सख्त बलात्कार विरोधी कानून पारित किया गया, जिसमें न्यायाधीशों को कुछ बलात्कारियों को कैमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने की अनुमति दी गई. इसके साथ ही बलात्कार पीड़िताएं अपनी पहचान उजागर किए बिना अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं और तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन करने की बात की गयी.

लेकिन इमरान खान ने अपने इंटरव्यू में एक बार फिर कहा है कि पाकिस्तान में सबसे तेजी से बढ़ते अपराध यौन अपराध हैं और उनमें से केवल एक प्रतिशत ही रिपोर्ट किए जाते हैं.

इमरान ख़ान क्यों देते हैं ऐसे बयान?

लेकिन सवाल ये उठता है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान बार-बार इस तरह के बयान क्यों देते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया से लेकर स्थानीय मीडिया तक में उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ता है.

पाकिस्तान की राजनीति को गहराई से समझे वाले वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, "मुझे लगता है कि उन्होंने ज्वलंत मुद्दों पर हमेशा अपने विचारों को ख़ास तरजीह दी है और वह जिस चीज़ को ठीक समझते हैं, उसे बदलना नहीं चाहते हैं. इस वजह से वह ख़ासी समस्यों का सामना भी करते हैं. उदाहरण के लिए वह बार-बार ये कहते हैं कि महिलाएं जो पहनती हैं, उसकी पुरुषों द्वारा महिलाओं पर हमलों में एक भूमिका होती है. वह सोचते हैं और मानते हैं कि पाकिस्तान ने अफ़गान गुटों का समर्थन करके ग़लती की थी."

लेकिन सवाल ये भी है कि क्या इस तरह के बयानों का कोई राजनीतिक गणित होता है जिसके चलते वह न सिर्फ अपने विचार पर टिके हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्हें स्पष्टता से रखते भी हैं.

बीबीसी हिंदी संवाददाता अनंत प्रकाश से बात करते हुए हारून रशीद बताते हैं, "मुझे लगता है कि वह जिन धार्मिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह उन्हें उस तबके में बेहद लोकप्रिय बनाते हैं. और ये एक बहुत बड़ा तबका है जिसके लिए संरक्षणवादी पितृसत्तात्मक समाज अहम है. सत्तर के दशक से कट्टरपंथी धार्मिक विचारधारा के रास्ते पर चलते हुए पाकिस्तान को इसी तरह तैयार किया गया है."

वो कहते हैं "जब वह इस तरह की बात करते हैं तो उदारवादी पुरुषों की ओर से उन्हें मामूली प्रतिक्रियाएं मिलती हैं. विडंबना ये है कि पाकिस्तान की उदारवादी महिलाओं के पास इतनी शक्ति और प्रभाव नहीं है कि वह इस तरह के घृणित विचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर इमरान ख़ान जैसे शख़्स को अपने विचार बदलने के लिए मजबूर कर सकें. एक विडंबना ये भी है कि इमरान ख़ान की पार्टी महिलाओं के बीच ख़ासी लोकप्रिय है लेकिन वे भी इस मुद्दे पर उनका विरोध नहीं करती हैं. लेकिन वह इन विचारों से धार्मिक नेताओं को ख़ास तौर पर खुश कर लेते हैं."

इस विवाद में कई लोग इस बात पर भी ध्यान दिला रहे हैं कि सरकार में रेप को लेकर बेहतर समझ नहीं होना कैमिकल कैस्ट्रेशन जैसे क़ानून के रूप में सामने आ रहा है.

बीबीसी हिंदी संवाददाता अनंत प्रकाश से बात करते हुए पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार बेनज़ीर शाह कहती हैं, "ये पहला मौक़ा नहीं है जब प्रधानमंत्री ने इस तरह का बयान दिया हो. उनके बयान के मुताबिक़, दोष हॉलीवुड, बॉलीवुड फिल्मों, मोबाइल फोन की सामग्री, और महिलाओं के पहनावे में है. उनकी ओर से अब तक वो बयान नहीं आया है जिसके मुताबिक़, अपराध के लिए बलात्कारी को दोषी ठहराया जाए."

उनके बयान सिर्फ ख़तरनाक नहीं हैं बल्कि तथ्यात्मक रूप से ग़लत भी हैं. अब तक हुए कई अध्ययनों में ये सामने आया है कि दोषी सिद्ध हुए बलात्कारियों को ये तक याद नहीं रहता है कि जब उन्होंने हमला किया था तो पीड़िताओं ने क्या कपड़े पहने हुए थे.

पाकिस्तान में कुछ मामलों में छह महीने की बच्चियों तक का रेप हुआ है. पुरुषों और युवा लड़कों का भी रेप हुआ है. ऐसे में किसी के भी ज़हन में ये सवाल उठ सकता है कि प्रधानमंत्री के मुताबिक़ इनके लिए कौन सा ड्रेस कोड ठीक रहेगा.

प्रधानमंत्री का बयान पुरुषों के लिए भी काफ़ी आपत्तिजनक होना चाहिए क्योंकि उन्हें एक ख़ांचे में डाला जा रहा है कि वे यौन अपराधों के लिए बड़ी जल्दी प्रलोभित हो जाते हैं जैसे कि इस पर उनका अपना कोई नियंत्रण या फ़ैसला न हो.

प्रधानमंत्री के लिए ये समझना बेहद ज़रूरी है कि रेप एक हिंसात्मक कार्य है, वासनागत कार्य नहीं. सरकारी अमले में समझ में इसी कमी की वजह से सत्ताधारी पार्टी उन क़ानूनों को पास कराने का दबाव बना रही है जिनमें बार - बार बलात्कार करने वाले शख़्स को कैमिकल कैस्ट्रेशन की सज़ा दी जाए."

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की ओर से दिए गए बयान पर लोगों ने अपने - अपने अंदाज़ में विरोध और समर्थन जताया है.

लेकिन एक ट्विटर यूज़र ने अपनी प्रतिक्रिया के रूप में लाहौर के मशहूर लेखक सआदत हसन मंटों के लिखे इस वाक्य को साझा किया है -

"आप दुनिया की तमाम औरतों को बुर्क़ा पहना दें, फिर भी हिसाब आपको अपनी आँखों का देना होगा."

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