वह पेड़ जिसकी छाल ने संसार का नक्शा बदल दिया

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Celso Roldan/Getty Images

    • Author, विटोरिया ट्रैवर्सो
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

दक्षिण-पश्चिमी पेरू में जहां एंडीज और एमेज़न बेसिन मिलती है, वहीं पर मानु नेशनल पार्क है. 15 लाख हेक्टेयर में फैला यह पार्क धरती पर सबसे ज़्यादा जैव विविधता से भरी जगहों में से एक है. इसके ऊपर धुंध की चादर लिपटी रहती है और यहां लोगों का आना-जाना कम ही होता है.

नदियों को पार करके, जगुआर और प्यूमा से बचते हुए जब आप वर्षा वन के घने जंगल में पहुंचते हैं तो वहां सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस की कुछ बची हुई प्रजातियों को देख सकते हैं.

जो इन पेड़ों को नहीं जानते उनके लिए वर्षावन की सघन भूलभुलैया में 15 मीटर लंबे सिनकोना पेड़ों को पहचानना मुश्किल हो सकता है.

एंडीज की तलहटी में उगने वाले इस पेड़ ने कई मिथकों को जन्म दिया है और सदियों तक मानव इतिहास को प्रभावित किया है.

पेरू के एमेज़न क्षेत्र माद्रे डि डिओस में बड़ी हुई नटाली कैनेल्स कहती हैं, "हो सकता है कि बहुत से लोग इस पेड़ को न जानते हों, फिर भी इससे निकाली गई एक दवा ने मानव इतिहास में लाखों लोगों की जान बचाई है."

कैनेल्स फिलहाल डेनमार्क के नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में जीव वैज्ञानिक हैं जो सिनकोना के आनुवंशिक इतिहास का पता लगा रही हैं. इसी दुर्लभ पेड़ की छाल से मलेरिया की पहली दवा कुनैन बनाई गई थी.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Celso Roldan/Getty Images

मलेरिया की दवा

सैकड़ों साल पहले कुनैन की खोज होने पर दुनिया ने उत्साह और संदेह दोनों के साथ उसका स्वागत किया था. हाल में इस दवा पर फिर से बहस छिड़ी हुई है.

कुनैन के सिंथेटिक संस्करणों- क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन- को कोरोना वायरस का संभावित इलाज बताया गया है जिस पर काफी विवाद है.

मच्छरों के परजीवियों से होने वाली मलेरिया बीमारी सदियों से इंसान को त्रस्त करती रही है. इसने रोमन साम्राज्य को तबाह किया और 20वीं सदी में 15 से 30 करोड़ लोग मलेरिया से मारे गए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अब भी दुनिया की आधी आबादी उन इलाकों में रहती है जहां इस बीमारी का संक्रमण होता है.

'मलेरिया' का इटैलियन में अर्थ है ख़राब हवा. इस ग़लत धारणा की वजह से मध्ययुग में इसका इलाज भी ग़लत तरीके से करने की कोशिश होती थी.

शरीर का ख़ून निकालकर, अंगों को काटकर, यहां तक कि खोपड़ी में छेद करके मलेरिया का इलाज किया जाता था.

17वीं सदी में एंडीज के घने जंगलों में मलेरिया की पहली दवा खोजी गई. किंवदंतियों के मुताबिक कुनैन की खोज 1631 में हुई.

स्पेन की एक रईस महिला, काउंटेस ऑफ़ सिनकोना, की शादी पेरू के वाइसराय से हुई थी. वह बीमार पड़ गई. तेज़ बुखार के साथ उनको कंपकंपी होती थी, जो कि मलेरिया के लक्षण हैं.

पत्नी को ठीक करने के लिए वाइसराय ने उनको एक दवा पिलाई जो जेसुइट पुजारियों ने तैयार की थी.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, RPBMedia/Getty Images

पेड़ की छाल वाली दवा

इस दवा में एक पेड़ की छाल थी जिसे लौंग, गुलाब के पत्तों और कुछ अन्य सूखे पौधों के साथ पीसकर बनाया गया था.

काउंटेस ज़ल्द ही ठीक हो गईं. जिस करिश्माई पेड़ ने उनको ठीक किया था उसे 'सिनकोना' नाम दिया गया. आज यह पेरू और इक्वेडोर का राष्ट्रीय पेड़ है.

ज़्यादातर इतिहासकार इस कहानी को ग़लत बताते हैं, मगर इसमें कुछ हद तक सच्चाई है.

कुनैन एक क्षारीय यौगिक है जो सिनकोना की छाल में पाया जाता है. यह मलेरिया फैलाने वाले परजीवियों को मार सकता है. लेकिन इसकी खोज स्पेन के जेसुइट पुजारियों ने नहीं की थी.

कैनेल्स कहती हैं, "स्पेन के लोगों के आने से पहले ही क्वेचुआ, केनरी और चिमु आदिवासियों को कुनैन के बारे में मालूम था. उन्होंने ही स्पेनिश जेसुइट को छाल के बारे में बताया था."

ये तीनों आदिवासी समूह आज के समय के पेरू, बोलीविया और इक्वेडोर में रहते हैं. जेसुइट पुजारियों ने सिनकोना की दालचीनी जैसी छाल को पीसकर पाउडर बनाया जिसे आसानी से पचाया जा सकता था.

इसे 'जेसुइट पाउडर' कहा गया. कुछ ही दिनों में मलेरिया का इलाज करने वाली 'जादुई' दवा के बारे में यूरोप में चर्चा शुरू हो गई.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, ajiravan/Getty Images

कुनैन का व्यापार

1640 के दशक तक जेसुइट ने सिनकोना की छाल को पूरे यूरोप तक पहुंचाने के लिए व्यापारिक मार्ग बना दिए.

फ्रांस में, कुनैन से राजा लुई चौदहवें के बुखार का इलाज किया गया. रोम में, पोप के निजी चिकित्सकों ने पाउडर की जांच की और जेसुइट पुजारियों ने इसे लोगों में मुफ्त बांटा.

लेकिन प्रोटेस्टेंट इंग्लैंड में इस दवा को शक की नज़र से देखा गया. कुछ डॉक्टरों ने इसे कैथोलिक साजिश और 'पोप का ज़हर' करार दिया.

ओलिवर क्रॉमवेल की मौत मलेरिया की वजह से हुई. उन्होंने कथित तौर पर 'जेसुइट पाउडर' लेने से इंकार कर दिया था.

खैर, 1677 तक रॉयल कॉलेज ऑफ़ फिजिशियंस ने सिनकोना की छाल को दवा की आधिकारिक सूची में शामिल कर लिया. इसके बाद पूरे इंग्लैंड के डॉक्टर इससे मरीजों का इलाज कर सकते थे.

सिनकोना का जुनून बढ़ा तो यूरोपीयों ने स्थानीय लोगों को इसकी छाल लाने के काम में लगा दिया. वे वर्षा वन के अंदर जाकर पेड़ की छाल उतारते थे और पेरू के बंदरगाहों पर खड़े जहाजों तक पहुंचाते थे.

सिनकोना की मांग बढ़ी तो स्पेन ने एंडीज को 'दुनिया का दवा घर' घोषित कर दिया. ज़ल्द ही सिनकोना के पेड़ दुर्लभ होने लगे.

19वीं सदी में विदेशी कॉलोनियों में तैनात यूरोपीय सैनिकों को मलेरिया का ख़तरा बढ़ा तो सिनकोना की कीमत बढ़ गई.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Universal History Archive/Getty Images

सेना की ज़रूरत

'मलेरियल सब्जेक्ट्स' के लेखक डॉक्टर रोहन देब रॉय के मुताबिक कुनैन की पर्याप्त आपूर्ति सामरिक ज़रूरत बन गई.

देब रॉय कहते हैं, "औपनिवेशिक युद्धों में शामिल यूरोपीय सैनिक अक्सर मलेरिया से मर जाते थे. कुनैन जैसी दवा उनको ज़िंदा रहने और युद्ध जीतने के काबिल बनाती थी."

डच सैनिकों ने इंडोनेशिया में, फ्रांस ने अल्जीरिया में और अंग्रेजों ने भारत, जमैका और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में इसका इस्तेमाल किया.

1848 से 1861 के बीच ब्रिटिश सरकार ने उपनिवेशों में तैनात सैनिकों के लिए सिनकोना की छाल के आयात पर सालाना 64 लाख पाउंड ख़र्च किए.

इसीलिए इतिहासकारों ने कुनैन को "साम्राज्यवाद का औजार" कहा है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को आगे बढ़ाया.

ज़्यूरिख यूनिवर्सिटी में ट्रैवेल मेडिसिन की प्रोफेसर पेट्रिसिया स्लेगेनहाफ कहती हैं, "जिस तरह आज सभी देश कोविड-19 वैक्सीन बनाने की होड़ में हैं, उसी तरह उस समय कुनैन के लिए भाग-दौड़ मची थी."

सिनकोना की छाल के साथ उसके बीज की भी मांग बढ़ गई थी. देब रॉय कहते हैं, "ब्रिटिश और डच अपने उपनिवेशों में सिनकोना के पेड़ लगाना चाहते थे ताकि दक्षिण अमरीका पर उनकी निर्भरता कम हो जाए."

लेकिन सही बीज का चुनाव करना आसान नहीं था. सिनकोना की 23 प्रजातियां थी और उनमें कुनैन की मात्रा अलग-अलग थी. इस काम में स्वदेशी वनस्पति ज्ञान रखने वाले स्थानीय आदिवासियों ने उनकी मदद की.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Dizzy/Getty Images

भारत में सिनकोना के पेड़

1850 के दशक में अंग्रेज दक्षिण भारत में सिनकोना के पेड़ लगाने में सफल रहे, जहां मलेरिया का प्रकोप बहुत ज़्यादा था.

ब्रिटिश अधिकारियों ने ज़ल्द ही सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों को स्थानीय तौर पर तैयार कुनैन देना शुरू कर दिया.

कहा जाता है कि उन्होंने कुनैन का स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें जिन मिला दिया. इस तरह पहले टॉनिक वाटर और जिन एंड टॉनिक ड्रिंक का आविष्कार हुआ.

आज भी टॉनिक वाटर में कुनैन की थोड़ी सी मात्रा मिलती है. लेकिन 'जस्ट द टॉनिक' किताब की सह-लेखक किम वॉकर इस कहानी को मिथक मानती हैं.

"ऐसा लगता है कि उन्होंने इसमें वही मिलाया जो आसानी से उपलब्ध था- चाहे वह रम हो, ब्रांडी हो या अरक हो."

स्लेगेनहाफ का कहना है कि शरीर में कुनैन की उम्र कम होती है, इसलिए जिन या टॉनिक के साथ इसे पीना मलेरिया से सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकती.

इन सबके बावजूद मलेरिया की रोकथाम में जिन और टॉनिक का मिथक चलता रहा. विंस्टन चर्चिल ने कथित तौर पर कहा था, "इस पेय ने जितने अंग्रेजों की जान बचाई है उतनी जानें साम्राज्य के सभी डॉक्टरों ने मिलकर भी नहीं बचाई."

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Hulton Deutsch/Getty Images

कुनैन वाले ड्रिंक

बेशक, जिन और टॉनिक फ़ीवर ट्री से जुड़ा सिर्फ़ एक पेय है. आज पेरू में सबसे मशहूर कॉकटेल पिस्को साउर है जिसे अमरीकियों ने बनाया था.

मगर पेरू के लोगों में सबसे लोकप्रिय है बिटर, जो कुनैन के स्वाद वाला पिस्को टॉनिक है. यह देसी खोज है जिसे अक्सर एंडीज के मेज़ मोराडो (बैंगनी मक्का) के साथ मिलाकर पिस्को मोराडो टॉनिक बनाया जाता है.

कैंपरी, पिम्स या फ्रेंच लिलेट (जेम्स बॉन्ड के मशहूर वेस्पर मार्टिनी का प्रमुख घटक) में भी कुनैन का स्वाद होता है.

यह स्कॉटलैंड के इर्न-ब्रू और महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पसंदीदा पेय जिन एंड डबोनेट में भी मिलता है.

जिन एंड डबोनेट दरअसल एक भूख बढ़ाने वाला पेय है जिसे फ्रांस के केमिस्ट ने उत्तरी अमरीका की कॉलोनियों में तैनात सैनिकों के लिए तैयार किया था.

1970 के दशक में आर्टेमिसिनिन की खोज होने के बाद कुनैन की मांग कम हो गई. फिर भी दुनिया भर में कुनैन की विरासत बची हुई है.

इंडोनेशिया का बान-डुंग आज "जावा का पेरिस" के रूप में जाना जाता है, क्योंकि डच ने इस बंदरगाह शहर को दुनिया के सबसे बड़े कुनैन केंद्र में बदल दिया था

भारत, हांगकांग, सियरा लियोन, केन्या और श्रीलंका के तटीय क्षेत्रों में आज अंग्रेजी बड़े पैमाने पर बोली जाती है. इसी तरह मोरक्को, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में फ्रेंच बोली जाती है. इसकी एक वजह कुनैन भी है.

स्पेनिश में आज भी एक कहावत चलती है "ser más malo que la quina"- जिसका मोटे तौर पर मतलब है- कुनैन से भी कड़वा.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, Christophel Fine Art

कुनैन से कमाई

1850 के दशक में जब दुनिया भर में कुनैन की होड़ चल रही थी तब पेरू और बोलीविया दोनों ने सिनकोना की छाल के निर्यात पर एकाधिकार कर लिया था.

असल में, ला पाज़ के अधिकर नियोक्लासिकल कैथेड्रल और प्लाज़ा से भरे शहर के ऐतिहासिक केंद्र में कॉबलस्टोन की सड़कें सिनकोना की छाल से हुई कमाई से ही बनी थीं. एक समय बोलीविया के कुल कर राजस्व में सिनकोना का हिस्सा 15 फीसदी था.

सदियों तक चलती रही सिनकोना छाल की मांग ने इसके जंगल उजाड़ दिए. 1805 में इक्वेडोर के एंडीज में 25 हजार सिनकोना पेड़ थे. अब उस जगह पोडोकार्पस नेशनल पार्क है, जहां सिनकोना के सिर्फ़ 29 पेड़ बचे हैं.

कैनल्स का कहना है कि कुनैन से भरपूर प्रजातियों को एंडीज से हटाने के कारण सिनकोना के पेड़ों की आनुवांशिक संरचना बदल गई.

सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस

इमेज स्रोत, rchphoto/Getty Images

सिनकोना का संरक्षण

लंदन के रॉयल बोटैनिकल गार्डन के सहयोग से कैनल्स ने म्यूजियम में रखे पुराने सिनकोना छाल के नमूनों का अध्ययन किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि इंसान के कारण पेड़ों में क्या बदलाव हुए.

वह कहती हैं, "हमें लगता है कि अधिक दोहन होने से सिनकोना की छाल में कुनैन की मात्रा घट गई होगी."

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर कोरोना वायरस के संभावित इलाज के रूप में कुनैन के सिंथेटिक संस्करण हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के अध्ययन पर रोक लगा दी है.

हालांकि यह दवा अब पेड़ों की छाल से नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में बनाई जाती है, फिर भी कैनल्स का कहना है कि भविष्य में नई दवाओं की खोज के लिए सिनकोना और "दुनिया के दवाघर" का संरक्षण ज़रूरी है.

सरकारें सिनकोना के संरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रहीं, इसलिए कुछ स्थानीय संरक्षण समूहों ने यह काम शुरू किया है.

2021 में पेरू की आज़ादी के 200 साल पूरे होने पर सेमिला बेंडिटा नामक पर्यावरण संगठन ने 2,021 सिनकोना पेड़ लगाने की योजना बनाई है.

स्लेगेनहाफ को उम्मीद है कि एंडीज की जैव विविधता बचाने के और प्रयास भी होंगे. वह कहती हैं, "कुनैन की कहानी बताती है कि जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य साथ-साथ चल सकते हैं."

"लोग पेड़ों को वैकल्पिक चिकित्सा के साधन समझते हैं, जबकि चिकित्सा इतिहास की कुछ प्रमुख दवाइयां हमें पेड़ों से ही मिली हैं."

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

End of कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
End of मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

End of अपने आप को और दूसरों को बचाना

मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

End of मैं और मेरा परिवार
कोरोना वायरस के बारे में जानकारी
लाइन
कोरोना वायरस के बारे में जानकारी
कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी ट्रैवल पर इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी ट्रैवल को फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर फ़ॉलो कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)