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अमेरिका का ऑफ़र ईरान क्यों नहीं कर रहा है क़बूल?
ईरान वॉर के बारे में बुधवार को एक फंडरेज़र इवेंट में बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, "ईरान हमारे साथ डील करने को बेताब है."
ईरान की टॉप लीडरशिप के बारे में ट्रंप ने कहा, "वो हमारे साथ डील की बात खुल कर नहीं कह पा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि वो अपने ही लोगों के हाथों मारे जाएंगे. डर तो उन्हें इस बात का भी है कि वो हमारे हाथों मारे जाएंगे. ईरान जैसे देश का प्रमुख होना इस वक़्त शायद ही कोई चाहे."
ईरान वॉर को लेकर दोनों ही पक्षों के विरोधाभासी बयानों ने कन्फ़्यूज़न बढ़ा दिया है.
अमेरिका कह रहा है कि संघर्ष विराम को लेकर अच्छी बातचीत हो रही है तो वहीं ईरान ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा कि डील उसकी शर्तों पर होगी.
बुधवार को ईरान के सरकारी टीवी चैनल 'प्रेस टीवी' ने एक वरिष्ठ राजनीतिक-सुरक्षा अधिकारी के हवाले से दी गई जानकारी में कहा, "ईरान युद्ध अपनी शर्तों पर ख़त्म करेगा."
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि 'कई दिनों से अमेरिका ने अलग-अलग मध्यस्थों के ज़रिए संदेश भेजना शुरू कर दिया है.'
अराग़ची ने क्या कहा?
अराग़ची ने ईरान के सरकारी टीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ने ईरान तक "मित्रवत देशों के ज़रिए संदेश भेजे". उन्होंने कहा कि "ईरान ने अपनी स्थिति बताई है और चेतावनी देकर इन संदेशों का जवाब दिया है."
अराग़ची ने कहा, "यह न तो बातचीत है, न मोल-भाव और न ही ऐसा कुछ है."
उन्होंने कहा, "ईरान की नीति अब भी अपनी सुरक्षा करने की है और अभी बातचीत का कोई इरादा नहीं है."
अराग़ची ने आगे कहा, "यह इसराइल की लड़ाई है और अमेरिका के साथ ही इस इलाक़े के लोग इसकी कीमत चुका रहे हैं."
ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं
यानी अमेरिका जहां ईरान के साथ बातचीत में प्रगति की बात कर रहा है, वहीं ईरान इसे पूरी तरह खारिज कर रहा है.
बीबीसी फारसी सेवा के संपादक आमिर अज़ीमी के मुताबिक़ यह असहमति दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास को दिखाती है, जो पिछली बार की बातचीत से पैदा हुआ है.
इस लड़ाई के दौरान दो बार ऐसा हुआ जब तनाव कम होने की उम्मीद जगी.
लेकिन दोनों ही बार उसके बाद इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर सैन्य हमले किए.
ईरान के नजरिए से देखें तो बातचीत ने युद्ध की संभावना कम नहीं की, बल्कि बातचीत की संभावना के ठीक बाद ही उस पर लगातार हमले हुए. यही वजह है कि ट्रंप के दावों को ईरान शक़ की नज़र से देख रहा है.
हालांकि, ईरान के इनकार का मतलब ये नहीं है कि वो बातचीत के ख़िलाफ़ है. मामला इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा है.
यहां तक कि जो अधिकारी कूटनीति का समर्थन करते हैं, वे भी दबाव में हैं. 28 फ़रवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले किए उसके पहले भी अमेरिका की ईरान के साथ बातचीत चल ही रही थी.
ऐसे में दोबारा बातचीत की कोशिश करना जोख़िम भरा हो सकता है.
पिछली बार की तरह क्या इस बार हालात अलग होंगे, इसका भी कोई साफ़ संकेत नहीं है. यही वजह है कि विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची और अन्य अधिकारियों का रुख़ इस बार सख़्त नज़र आता है.
कौन क्या चाहता है?
बीबीसी के सुरक्षा संवाददाता फ़्रैंक गार्डनर के मुताबिक़ जब एक पक्ष, यानी अमेरिका, कहता है कि युद्ध ख़त्म करने के लिए बातचीत चल रही है और दूसरा पक्ष, यानी ईरान, कहता है कि "नहीं, ऐसा कुछ नहीं हो रहा", तो आखिर किस पर भरोसा किया जाए?
यह ज़रूर है कि अमेरिका से ईरान तक संदेश पहुंच रहे हैं, लेकिन सीधे नहीं बल्कि पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों के ज़रिए, जिनके दोनों सरकारों से अच्छे संबंध हैं.
लेकिन अब भी ये 'समझौते' जैसी स्थिति नहीं है, शायद यही वजह है कि ईरान के एक सैन्य प्रवक्ता ने साफ़ तौर पर इसे खारिज कर दिया है.
हालात अब कुछ हद तक रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे बन रहे हैं जिसे ख़त्म करने को लेकर लगातार गतिरोध बना हुआ है.
जब यह युद्ध शुरू हुआ था, तब अमेरिका और इसराइल को उम्मीद थी कि उनकी ज़बरदस्त ताक़त के कारण ईरान में इस्लामिक गणराज्य का पतन लगभग तय है.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसलिए अमेरिका और इसराइल जो चाहते हैं, वह ज़रूरी नहीं कि उन्हें मिल ही जाए, क्योंकि हर दिन ईरानी शासन के टिके रहने से वहां की लीडरशिप का आत्मविश्वास और बढ़ता दिख रहा है.
उधर, खाड़ी के अरब देश भी इस स्थिति से परेशान हैं.
उन्होंने हैरानी के साथ देखा है कि अमेरिका ने इस युद्ध में पूरी ताकत लगा दी, लेकिन ईरानी शासन को गिरा नहीं पाया. उल्टा, अब वह और ताक़त से खाड़ी के अपने पड़ोसी मुल्कों पर हमले कर रहा है.
ईरान का मानना है कि उसके पास समय और भौगोलिक बढ़त दोनों हैं और जैसे-जैसे ट्रंप प्रशासन दुनिया को यह बताता है कि ईरान किसी समझौते के लिए बेताब है, वैसे-वैसे ईरान के लिए ऐसा समझौता करने की इच्छा और कम होती जाती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.