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कौन हैं वो लोग जो चलाते हैं हमास
- Author, लीना अलशवाबकेह
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, अम्मान
- पढ़ने का समय: 14 मिनट
हमास ने कहा है कि उसके शीर्ष नेता इस्माइल हनिया ईरान की राजधानी तेहरान में मारे गए हैं. हनिया की मौत ऐसे समय हुई है जब ग़ज़ा में इसराइली हमले जारी हैं.
इस्माइल हनिया क़तर में रहते थे और पिछले कई सालों से वह ग़ज़ा पट्टी नहीं गए थे. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह हमास का सबसे बड़ा चेहरा थे.
हमास के लड़ाकों ने सात अक्टूबर को इसराइल पर हमला कर दिया था. इसके जवाब में इसराइल ने हमास को ख़त्म करने की क़सम खाई थी और उसके हमले में अब तक करीब 39000 फ़लस्तीनियों की मौत हो चुकी है.
फ़लस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास का ग़ज़ा पर नियंत्रण है. उसके कई वरिष्ठ नेता मीडिया में चेहरा ढंके हुए नज़र आते हैं.
वहीं उसके अन्य नेताओं ने अपना अधिकांश जीवन इसराइल के हत्या के प्रयासों से बचने में बिताया है.
आइए हम हमास के प्रमुख वर्तमान नेताओं, राजनीतिक हस्तियों और उसके इज़े-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के सैन्य कमांडरों के बारे में जानते हैं.
इस्माइल हनिया
इस्माइल हनिया हमास के पॉलिटिकल ब्यूरो के प्रमुख थे और वे फ़लस्तीनी प्राधिकरण की दसवीं सरकार के प्रधानमंत्री थे. उनका उपनाम अबू-अल-अब्द है. उनका जन्म फलस्तीनी शरणार्थी शिविर में हुआ था.
इसराइल ने उन्हें 1989 में तीन साल के लिए कैद कर लिया था. इसके बाद उन्हें हमास के कई नेताओं के साथ मार्ज-अल-ज़ुहुर निर्वासित कर दिया गया था. यह इसराइल और लेबनान के बीच एक नो-मेंस लैंड हैं. वहां वे एक साल तक रहे.
निर्वासन पूरा होने के बाद वो ग़ज़ा लौट आए. उन्हें 1997 में हमास आंदोलन के आध्यात्मिक नेता शेख अहमद यासीन के कार्यालय का प्रमुख नियुक्त किया गया. इससे उनकी हैसियत बढ़ गई.
हमास ने 16 फरवरी 2006 को उन्हें फ़लस्तीनी प्राधिकरण का प्रधानमंत्री नामित किया था. उन्हें उसी साल 20 फरवरी को नियुक्त भी कर दिया गया था. लेकिन एक साल बाद ही फ़लस्तीनी नेशनल अथॉरिटी के प्रमुख महमूद अब्बास ने उन्हें उनके पद से बर्खास्त कर दिया.
ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इज़-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड ने ग़ज़ा पट्टी पर कब्जा कर लिया था. उसने अब्बास के फतह आंदोलन के प्रतिनिधियों को निकाल दिया था. एक हफ्ते तक चली लड़ाई में कई लोग मारे गए थे.
हनिया ने अपनी बर्खास्तगी को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया था. उनका कहना था कि उनकी सरकार अपने कर्तव्यों को जारी रखेगी और फ़लस्तीनी लोगों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को नहीं छोड़ेगी.
उसके बाद से हनिया ने कई बार फतह के साथ सुलह की अपील भी की. हनिया को छह मई 2017 को हमास के पॉलिटिकल ब्यूरो का प्रमुख चुना गया था. अमेरिका के विदेश विभाग ने 2018 में हनिया को आतंकवादी घोषित किया था.
मोहम्मद दीफ़
मोहम्मद दीफ़ ने उन सुरंगों को बनाने की योजना बनाई जिससे हमास के लड़ाके ग़ज़ा से इसराइल में दाख़िल हुए. उनका असली नाम मोहम्मद दीब अल-मसरी है. उनके पुकार का नाम अबू खालिद और अल दीफ़ है.
वह हमास के सैन्य संगठन इज़े-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के प्रमुख हैं. उनका जन्म 1965 में ग़ज़ा में हुआ था.
फ़लस्तीनी उन्हें मास्टरमाइंड के रूप में जानते हैं. वहीं इसराइली उन्हें 'द मैन ऑफ डेथ' या 'द फाइटर विद नाइन लाइव्स' के नाम से पुकारते हैं.
मोहम्मद दीफ़ ने इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ ग़ज़ा से जीव विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली है. यूनिवर्सिटी में वे अभिनय और थियेटर के प्रति अपने प्रेम के लिए जाने जाते थे. उन्होंने कलाकारों का एक ग्रुप बनाया था.
जब हमास की स्थापना की घोषणा हुई तो वो बिना किसी हिचकिचाहट के इसमें शामिल हो गए. इसराइली अधिकारियों ने उन्हें 1989 में गिरफ्तार कर लिया और उन्होंने 16 महीने हिरासत में बिताए.
जेल में रहने के दौरान दीफ़ ने इसराइली सैनिकों को पकड़ने के उद्देश्य से हमास से अलग एक आंदोलन स्थापित करने के लिए ज़कारिया अल-शोरबागी और सलाह शेहादेह के साथ सहमति जताई. यही बाद में अल-क़ासम ब्रिगेड बन गया.
जेल से रिहा होने के बाद दीफ़ इज़े-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के प्रमुख नेता के रूप में उभरे. वो इसके संस्थापकों में से एक थे.
दीफ़ उन सुरंगों के निर्माण के इंजीनियर थे, जिनसे होकर हमास के लड़ाके ग़ज़ा से इसराइल में दाखिल हुए थे. इसके साथ ही वो उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने बहुत अधिक संख्या में रॉकेट छोड़ने की रणनीति को बढ़ावा दिया.
हालांकि उन पर ऊपर सबसे गंभीर आरोप हमास के लिए बम बनाने वाले याह्या अयाश की हत्या का बदला लेने की योजना बनाने का है. इन अभियानों के दौरान एक बस पर हुए बम हमले में करीब 50 इसराइलियों की मौत हो गई थी.
यह घटना 1996 की शुरुआत में हुई थी. इसके अलावा उनका नाम 1990 के दशक में तीन इसराइली सैनिकों को अगवा कर हत्या करने के मामले में भी आया था. इसराइल ने 2000 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था. लेकिन 'दूसरे इत्तेफादा' की शुरुआत में वो उसकी जेल से फरार होने में सफल हो गए थे.
दीफ़ की तीन तस्वीरें हैं- एक बहुत पुरानी है, दूसरी उसकी नकाबपोश तस्वीर है और तीसरी उनकी परछाई की तस्वीर है. उनकी हत्या का सबसे गंभीर प्रयास 2002 में हुआ था. लेकिन वो चमत्कारिक रूप से बच गए थे.
इस हमले में उनकी एक आंख चली गई. हालांकि इसराइल का कहना है कि उन्होंने एक पैर और एक हाथ भी खो दिया था. हत्या के प्रयासों का शिकार होने के बाद उन्हें बोलने में भी कठिनाई होती है.
साल 2014 में ग़ज़ा पर करीब 50 दिन तक हुए हमले के दौरान भी इसराइली सेना उनकी हत्या करने में नाकाम रही. लेकिन उसने उनकी पत्नी और दो बच्चों की हत्या कर दी.
'द क्लाउन' नाम के नाटक में अबू खालिद का रोल करने की वजह से उन्हें अबू खालिद के नाम से भी पुकारा जाने लगा. अबू खालिद एक ऐतिहासिक चरित्र है, जो शुरुआती मध्यकाल में उमय्या और अब्बासी काल के बीच पैदा हुए थे.
दीफ़ शब्द का इस्तेमाल अरबी में अतिथि के लिए होता है. यह नाम उन्हें इसलिए मिला क्योंकि वो एक जगह पर बहुत अधिक समय तक नहीं रहते हैं. इसराइली हमलों से बचने के लिए हर रात वो अलग-अलग जगह पर सोते हैं.
मारवान इस्सा
इसराइल मारवान इस्सा को शब्दों की जगह कर्मों वाला व्यक्ति बताता है. उसका कहना है कि वो इतने चतुर हैं कि प्लास्टिक को धातु में बदल सकते हैं. मारवान इस्सा को मोहम्मद दीफ़ का दाहिना हाथ माना जाता है. वो इज़-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के डिप्टी कमांडर-इन-चीफ और हमास आंदोलन के राजनीतिक और सैन्य ब्यूरो के सदस्य हैं.
इसराइली सुरक्षा बलों ने उन्हें 'पहले इंतेफ़ादा' के दौरान हिरासत में लिया था. हमास के साथ सक्रियता की वजह से इसराइल ने उन्हें पांच साल तक हिरासत में रखा. वो हमास से अपनी जवानी के दिनों में ही जुड़ गए थे.
इसराइल का कहना है कि जब तक वह जीवित रहेगा, हमास के साथ उसका 'दिमागी युद्ध' चलता रहेगा.
इस्सा एक प्रतिष्ठित बास्केटबॉल खिलाड़ी के रूप में उभरे. लेकिन खेल उनका करियर नहीं बना, क्योंकि इसराइल ने 1987 में उन्हें हमास में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था.
फ़लस्तीनी प्राधिकरण ने उन्हें 1997 में गिरफ्तार कर लिया था. उन्हें तब तक रिहा नहीं किया गया, जब तक कि 2000 'अल-अक्सा इंतेफ़ादा' शुरू नहीं हुआ. जेल से रिहा होने के बाद इस्सा ने इज़-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड में सैन्य प्रणालियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
हमास में महत्वपूर्ण भूमिका की वजह से इस्सा का नाम इसराइल की मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट में शामिल है. साल 2006 में दीफ़ और इज़-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के प्रमुख नेताओं की एक बैठक के दौरान इसराइल ने उनकी हत्या का प्रयास किया. इस हमले में वो घायल हो गए थे. लेकिन उन्हें मिटाने का इसराइली प्रयास सफल नहीं हुआ.
इसराइली लड़ाकू विमानों ने 2014 में ग़ज़ा पर हमले के दौरान उनके घर को तबाह कर दिया. इसमें उनके एक भाई की मौत हो गई थी.
साल 2011 तक उनका चेहरा किसी ने नहीं देखा था. दरअसल उस साल एक ग्रुप फोटो आई थी. यह फोटो इसराइली सैनिक ग्लेड शालित की रिहाई के बदले रिहा किए गए फ़लस्तीनी कैदियों के स्वागत समारोह की थी.
उन्हें अबू अल-बारा के नाम से भी जाना जाता है. उनका नाम घुसपैठ की योजनाएं बनाने में आया है. इनमें 2012 के 'शेल स्टोन्स' से लेकर 2023 के 'अल-अक्सा फ्लड' जैसे अभियान शामिल हैं.
ज़मीनी ताक़त, ख़ुफ़िया और तकनीकी बल, संगठित और सटीक योजना बनाना, बस्तियों और सुरक्षा मुख्यालयों पर हमले पर ध्यान देना, उनके इन हमलों में शामिल होने के संकेत हैं.
याह्या सिनवार
अमेरिका ने सितंबर 2015 में याह्या सिनवार का नाम अपने अंतरराष्ट्रीय चरमपंथियों की काली सूची में डाला था.
सिनवार हमास के नेता हैं. वो ग़ज़ा पट्टी में इसके पॉलिटिकल ब्यूरो के प्रमुख हैं. साल 1962 में पैदा हुए सिनवार हमास की सिक्योरिटी सर्विस 'मज्द' के संस्थापक हैं.
मज्द ग़ज़ा में आंतरिक सुरक्षा का काम देखता है. इसमें संदेहास्पद इसराइली एजेंटों की जांच-पड़ताल जैसे काम शामिल हैं. वो खुद इसराइली ख़ुफ़िया और सिक्योरिटी सर्विस के अधिकारियों पर नज़र रखते हैं.
सिनवार को तीन बार गिरफ्तार किया जा चुका है. इसराइली सुरक्षा बलों ने पहली बार उन्हें 1982 में गिरफ्तार किया था. उस समय उन्हें चार महीने तक जेल में रखा गया था.
सिनवार को 1988 में तीसरी बार गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. वो जेल में सज़ा काट रहे थे. इस दौरान हमास की एक मिसाइल ने इसराइली सैनिक ग्लेड शालित के टैंक को तबाह कर दिया था.
शालित कई मायनों में एक सामान्य व्यक्ति थे जिनमें लोग अपना अक्स देख सकते थे. आम लोगों की नज़र में वो उनका बेटा हो सकता था या भाई और इसराइली सरकार पर उन्हें रिहा करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करने का दबाव पड़ा. ये क़ैदियों की अदला-बदली के एक समझौते के रूप में हुआ जिसे कुछ फ़लस्तीनी 'लॉयल्टी ऑफ़ दी फ़्री' कहते हैं. इसमें फतह और हमास मूवमेंट के कई क़ैदी शामिल थे, और उनमें से याह्या सिनवार भी थे, जिन्हें 2011 में रिहा किया गया था.
इसराइल की कैद से रिहा होने के बाद सिनवार हमास में अपने पुराने पदों पर फिर लौट गए. सिनवार को 13 फरवरी 2017 को ग़ज़ा पट्टी में हमास के पॉलिटिकल ब्यूरो का प्रमुख नियुक्त चुना गया. उन्होंने इस्माइल हानिया की जगह ली.
अब्दुल्ला बरग़ूती
'इंजीनियर' ने डेटोनेटर बनाने के अलावा आलू से विस्फोटक उपकरण और विषाक्त पदार्थ भी बनाए हैं.
बरग़ूती का जन्म 1972 में कुवैत में हुआ था. वो 1990 में दूसरे खाड़ी युद्ध के बाद जॉर्डन रहने चले गए थे.
दक्षिण कोरियाई विश्वविद्यालय में तीन साल तक इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने से पहले तक उनके पास जॉर्डन की नागरिकता थी. वहां से उन्होंने विस्फोटक बनाना सीखा. वो अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके क्योंकि उससे पहले ही उन्हें फ़लस्तीनी इलाके में प्रवेश करने का परमिट मिल गया था.
उनके आस-पास के लोगों में से कोई भी उनकी विस्फोटक बनाने की क्षमता के बारे में नहीं जानता था. एक दिन वो अपने चचेरे भाई बिलाल अल बरग़ूती को वेस्ट बैंक के एक दूरदराज़ के इलाके में ले गए. वहां उन्होंने अपने कौशल का प्रदर्शन किया.
बिलाल ने अपने कमांडर को बताया कि उन्होंने क्या देखा था. इसके बाद अब्दुल्ला बरग़ूती को इज़-अल-दीन अल-क़ासम ब्रिगेड के रैंक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया.
अब्दुल्ला बरग़ूती ने अपने कस्बे के एक गोदाम में सैन्य उत्पादन के लिए एक विशेष कारखाना लगाया था. बरग़ूती को इसराइली सुरक्षा बलों ने 2003 में संयोगवश गिरफ्तार कर लिया था. उनसे तीन महीने तक पूछताछ की गई थी.
बरग़ूती को दर्जनों इसराइलियों की मौत के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है. उन पर जब दूसरी बार मुकदमा चलाया गया तो सुनवाई में इन मृतकों के परिजन भी शामिल हुए.
उन्हें इसराइल के इतिहास में सबसे लंबी सज़ा दी गई थी. उन्हें 67 आजीवन कारावास और 52 सौ साल के जेल की सज़ा सुनाई गई थी. उन्हें कुछ समय के लिए एकांतवास में रखा गया था. इसके विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. इसके बाद उनका एकांत कारावास ख़त्म कर दिया गया था.
बरग़ूती को 'प्रिंस ऑफ शैडो' के नाम से भी जाना जाता है. उन्हें जेल के अंदर इसी नाम से लिखी गई किताब के बाद 'प्रिंस ऑफ द शैडो' उपनाम मिला था. इस किताब में उन्होंने अपने जीवन और अन्य कैदियों के साथ किए गए अभियानों के बारे में बताया है.
ख़ालिद मशाल
मशाल हमास आंदोलन के संस्थापकों में से एक हैं. वे इसकी स्थापना के बाद से ही इसके पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य हैं. मशाल 'अबू अल-वालिद' का जन्म 1956 में वेस्ट बैंक के सिलवाड गांव में हुआ था. उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा वहीं हासिल की. बाद में उनका परिवार कुवैत चला गया, जहां उन्होंने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की.
मशाल 1996 और 2017 के बीच हमास के पॉलिटिकल ब्यूरो के अध्यक्ष भी रहे. साल 2004 में शेख अहमद यासीन की मौत के बाद मशाल को इसका नेता नियुक्त किया गया.
इसराइल की खुफिया सेवा मोसाद ने 1997 में उन्हें निशाना बनाया. इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के निर्देश पर उनकी हत्या का प्रयास किया गया. नेतन्याहू ने मोसाद के प्रमुख को मशाल की हत्या की योजना बनाने के निर्देश दिए थे.
मोसाद के दस एजेंट नकली कनाडाई पासपोर्ट पर जॉर्डन में दाखिल हुए थे. ख़ालिद मशाल के पास उस समय जॉर्डन की नागरिकता थी. राजधानी अम्मान की एक सड़क पर चलते समय उन्हें एक ज़हरीले पदार्थ का इंजेक्शन लगाया गया था.
जॉर्डन के अधिकारियों ने हत्या के इस प्रयास का पता लगाया. उन्होंने इसमें शामिल मोसाद के दो एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया था. उस समय जॉर्डन के राजा हुसैन ने इसराइली प्रधानमंत्री से मशाल को दिए गए ज़हरीले पदार्थ के लिए एंटीडोट मांगा था. लेकिन नेतन्याहू ने शुरू में इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया.
उनकी हत्या की कोशिश ने एक राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया. इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने नेतन्याहू को एंटीडोट देने के लिए मजबूर किया.
मशाल ने पहली बार सात दिसंबर 2012 को ग़ज़ा पट्टी का दौरा किया था. जब वह 11 साल के थे तो उन्होंने फ़लस्तीन छोड़ दिया था. उसके बाद यह फ़लस्तीनी क्षेत्र की उनकी पहली यात्रा थी.
राफ़ा क्रॉसिंग पर फ़लस्तीन के नेताओं ने उनका स्वागत किया था. ग़ज़ा शहर में उनके पहुंचने पर फ़लस्तीनियों की भीड़ सड़क पर उनका स्वागत करने के लिए उमड़ पड़ी थी.
महमूद ज़हार
हमास आंदोलन की स्थापना के छह महीने बाद ही महमूद ज़हार को इसराइल ने हिरासत में ले लिया था.
ज़हार का जन्म 1945 में ग़ज़ा में हुआ था. उनके पिता फ़लस्तीनी और मां मिस्र की रहने वाली थीं. उनका बचपन मिस्र के इस्माइलिया शहर में बीता. उनकी प्राथमिक, मिडिल और माध्यमिक शिक्षा ग़ज़ा में हुई.
उन्होंने काहिरा के ऐन शम्स विश्वविद्यालय से 1971 में जनरल मेडिसिन में स्नातक की डिग्री ली. इसके बाद 1976 में उन्होंने जनरल सर्जरी में पीजी किया. स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने ग़ज़ा और खान के एक अस्पताल में डॉक्टर के रूप में काम किया. उन्होंने वहां तब तक काम किया जब तक कि इसराइल ने उन्हें उनकी राजनीतिक गतिविधियों की वजह से बर्खास्त नहीं कर दिया.
ज़हार को हमास के प्रमुख नेताओं में से एक गिना जाता है. उन्हें हमास आंदोलन के राजनीतिक नेतृत्व का सदस्य माना जाता है. हमास की स्थापना के छह महीने बाद ही 1988 में महमूद ज़हार को इसराइली जेल में छह महीने तक रखा गया था. इसराइल ने उन्हें 1992 में अन्य नेताओं के साथ मार्ज-अल-ज़ुहुर निर्वासित कर दिया गया था. वहां एक साल तक रहे.
साल 2005 में कराए गए चुनाव में हमास को बहुमत मिला था. ज़हार ने प्रधानमंत्री इस्माइल हानिया की सरकार में विदेश मंत्री के रूप में काम किया. इसके बाद राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने सरकार को बर्खास्त कर दिया था. इससे फ़लस्तीनियों में विभाजन हुआ था.
इसराइल ने 2003 में ज़हार की हत्या का प्रयास किया. एक एफ-16 विमान ने ग़ज़ा शहर के पास रिमल में ज़हार के घर पर बम गिरा दिया था. कहा जाता है कि यह बम पांच क्विंटल का था. इस हमले में उन्हें मामूली चोटें आई थीं. लेकिन उनके बड़े बेटे ख़ालिद की मौत हो गई थी.
उनके दूसरे बेटे होसाम की ग़ज़ा के पूर्वी इलाक़े में 15 जनवरी 2008 को इसराइली सेना की कार्रवाई में मौत हो गई थी. इस हमले में होसाम समेत 18 लोगों की मौत हुई थी. होसाम भी क़ासम ब्रिगेड के सदस्य थे.
ज़हार ने बौद्धिक, राजनीतिक और साहित्यिक रचनाएं की हैं. इनमें 'द प्रॉब्लम ऑफ़ अवर कंटेम्परेरी सोसाइटी... ए कुरानिक स्टडी', 'नो प्लेस अंडर द सन' शामिल है. यह बिन्यामिन नेतन्याहू की एक किताब की प्रतिक्रिया में लिखी गई किताबें हैं. इसके अलावा उन्होंने 'ऑन द पेवमेंट' के नाम से एक उपन्यास भी लिखा है.
(नोट: ये कहानी मूल रूप से 15 अक्टूबर 2023 को प्रकाशित हुई थी)
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