पीएम मोदी का ईरान के राष्ट्रपति से बात करना किस बात का संकेत है?

पीएम नरेंद्र मोदी ने शनिवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बात की

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शनिवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बात की. इसकी जानकारी उन्होंने एक्स पर दी.

उन्होंने 'क्षेत्र के अहम ऊर्जा ढांचों पर हो रहे हमलों' की निंदा की और कहा कि 'इससे ग्लोबल तेल सप्लाई पर असर पड़ा है.'

शनिवार को ही संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय ने 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में जहाज़ों पर हुए ईरानी हमलों' पर 22 देशों का एक संयुक्त बयान जारी किया. इसमें उन हमलों की निंदा की गई, जो व्यापारिक जहाज़ों पर हुए.

इन 22 देशों में भारत का नाम शामिल नहीं है.

यानी भारत ने ईरान की आलोचना करने से परहेज़ किया.

जबकि इससे पहले भारत ने खाड़ी देशों के कई नेताओं से बात करके वहां हुए ईरानी हमलों की निंदा की थी.

उन्होंने दो मार्च को इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू से भी बात करके क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर ज़ोर दिया था.

शनिवार को भारत ने ईरान को लेकर जो रुख़ अपनाया वो पहले के रुख़ से बिलकुल उलट ना सही लेकिन अलग ज़रूर है.

इससे पहले ईरान वॉर को लेकर पीएम मोदी क्षेत्र में शांति, स्थिरता और बातचीत का रास्ता अपनाने पर ज़ोर देते रहे हैं.

लेकिन ये पहली बार था जब ईरानी राष्ट्रपति से बात करते हुए उन्होंने ऊर्जा केंद्रों पर हमलों की निंदा की.

शनिवार को क्या हुआ?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान

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शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से बात की जानकारी एक्स पर देते हुए कहा, "डॉक्टर मसूद पेज़ेश्कियान से बात करके उन्हें ईद और नवरोज़ की बधाई दी. हम उम्मीद करते हैं कि त्योहार का ये माहौल पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और ख़ुशहाली लेकर आएगा."

"मैंने क्षेत्र के आधारभूत ढांचों पर हमलों की निंदा भी की जिसके कारण क्षेत्र की स्थिरता और दुनिया में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है. हमने समुद्री परिवहन की सुरक्षा और शिपिंग लेन्स खुले हों और सुरक्षित हों इसकी अहमियत पर ज़ोर दिया."

इसके कुछ घंटों बाद पीएम ने फारसी भाषा में भी पोस्ट कर इस बात की जानकारी दी.

जब से ईरान वॉर शुरू हुई है तब से ये सिर्फ़ दूसरा मौक़ा है जब मोदी ने पेज़ेश्कियान से बात की.

वहीं भारत में ईरान के दूतावास ने भी मोदी और पेज़ेश्कियान के बीच बातचीत की जानकारी एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, "राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने पीएम मोदी को बताया कि ईरान ने युद्ध की शुरुआत नहीं की. और बिना किसी उकसावे के ईरान को निशाना बनाया गया जिसमें स्कूली बच्चों समेत कई निर्दोष नागरिक मारे गए. उन्होंने कहा कि संघर्ष रोकने के लिए ज़रूरी है कि अमेरिका और इसराइल तुरंत अपने हमले रोकें और भविष्य में ऐसे हमले दोबारा ना हों इसकी गारंटी दें."

पेज़ेश्कियान ने भारत की सदस्यता वाले ब्रिक्स का ज़िक्र करते हुए अपील की कि वह ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक कार्रवाइयों को रोकने और क्षेत्रीय व वैश्विक शांति बनाए रखने में स्वतंत्र भूमिका निभाए.

पीएम मोदी ने इससे पहले 12 मार्च को भी ईरान के राष्ट्रपति से बात की थी.

उसमें मोदी ने क्षेत्र में तनाव पर चिंता ज़ाहिर की थी और कहा था कि भारत चाहता है कि सारे मुद्दे बातचीत और कूटनीति के ज़रिए हल किए जाएं.

उन्होंने अमेरिका और इसराइल का सीधे सीधे नाम ना तब लिया था ना अब लिया है.

फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि विशेषज्ञ इसे अलग नज़रिए से देख रहे हैं.

विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि पहली बार ईरान से बातचीत के दौरान मोदी ने क्षेत्र में हो रहे हमलों की निंदा की और तेल की सप्लाई सुनिश्चित कराने पर ज़ोर दिया.

भारत का रुख़ इस बार अलग क्यों?

भारतीय पोत नंदा देवी एलपीजी सप्लाई लेकर 17 मार्च को गुजरात के जामनगर पहुंचा

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दक्षिण एशिया मामलों के जानकार माइकल कुगलमैन कहते हैं, "मोदी ने पेज़ेश्कियान से बातचीत के दौरान क्रिटिकल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमलों की निंदा की. ये इनडायरेक्ट ही सही लेकिन उन्होंने पहली बार ईरान वॉर में अमेरिका और इसराइल के एक्शन की आलोचना की. ये दिखाता है कि अमेरिकी-इसराइली एक्शन किस कदर भारत के आर्थिक और ऊर्जा हितों पर गंभीर ख़तरा डाल रहे हैं."

युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाज़ों के निकलने पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी है.

बीबीसी वेरीफ़ाई के मुताबिक़, युद्ध शुरू होने के बाद के 20 दिनों में होर्मुज़ से सिर्फ़ 99 जहाज़ों को निकलने की अनुमति दी गई.

इस क्षेत्र से दुनिया भर को होने वाली तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा गुज़रता है.

इसके बाद इसराइल ने ईरान के और ईरान ने खाड़ी देशों के कई अहम तेल ठिकानों पर हमले किए.

इसकी वजह से दुनिया भर में तेल संकट पैदा हो गया है. भारत पर भी इसका असर पड़ता दिख रहा है.

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी संवाददाता संदीप राय से बात करते हुए कहा, "ईरान के प्रति भारत के रुख़ में आ रहे बदलाव का प्रमुख कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा है. अगर होर्मुज़ स्ट्रेट ब्लाकेड लंबे समय तक चला तो देश में ईंधन संकट खड़ा हो जाएगा क्योंकि देश का 60 से 70 फ़ीसदी ईंधन इसी संकरे समुद्री जलमार्ग से होकर गुजरता है."

धनंजय त्रिपाठी

गहराता ईंधन संकट

भारत सरकार ने एलपीजी की दिक़्क़त से इनकार किया लेकिन कई शहरों में लंबी कतारें देखी गईं

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भारत के कई शहरों में एलपीजी सिलिंडरों को लेकर लंबी कतारें देखी जा रही हैं. हालांकि सरकार ने कहा है कि एलपीजी संकट को लेकर पैनिक फैलाया जा रहा है.

वहीं सामान्य पेट्रोल के दाम तो अब तक नहीं बढ़ाए गए हैं लेकिन प्रीमियम पेट्रोल के दाम दो रुपए प्रति लीटर बढ़ गए हैं और राजधानी दिल्ली में इसकी क़ीमत 102 रुपए लीटर हो गई है.

एक्सपर्ट के मुताबिक़, होर्मुज़ पर आवाजाही बंद होने से भारत पर भी इसका बुरा असर पड़ा है.

फ़ाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, तेल और गैस ही नहीं बल्कि फ़र्टिलाइज़र्स वगैरह पर भी भारत खाड़ी देशों पर निर्भर है. मिडिल ईस्ट में बसे लगभग एक करोड़ भारतीयों से हर साल 51 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा मिलती है. इस वजह से ये पूरा युद्ध भारत पर भारी पड़ रहा है.

धनंजय त्रिपाठी ने ये भी कहा, कि "इस समय ब्रिक्स देशों की प्रेसिडेंसी भारत के पास है, जिसमें ईरान भी अभी इसका सदस्य है. ईरान चाहता है कि भारत इस बारे में कोई स्टैंड ले. तो भारत की ओर से इस पर कुछ पहल हो सकती है. इसलिए ईरान भी भारत के साथ बातचीत कर रहा है."

वहीं जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) के राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर रेशमी काज़ी के मुताबिक़, अब अमेरिका पर इस युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है क्योंकि ज़्यादातर देश इस जंग को निरुद्देश्य बता रहे हैं.

क्या तेल संकट की वजह से भारत अब ईरान को लेकर अपना स्टैंड बदल रहा है?

इस सवाल पर रेशमी काज़ी की अलग राय है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिंदी संवाददाता संदीप राय से कहा, "भारत ने कूटनीति को लेकर हमेशा मॉरल स्टैंड लिया है और उसी स्टैंड के तहत उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति से बात की. क्योंकि चुप रहना कोई स्टैंड नहीं होता."

पहले भारत की चुप्पी पर उठे थे सवाल

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी-इसराइली हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत की चुप्पी पर सवाल उठे थे (फ़ाइल फ़ोटो)

इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग के शुरुआती दो दिनों में भारत ने दो बयान जारी किए. एक बयान में इस जंग पर चिंता जताई गई और बातचीत से मुद्दे को सुलझाने की अपील की गई.

पीएम मोदी ने एक अन्य बयान में संयुक्त अरब अमीरात पर ईरान के हमले की 'कड़ी निंदा' की और कहा कि भारत उसके साथ खड़ा है. लेकिन भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल और अमेरिका के हमले की खुलकर निंदा नहीं की.

वहीं ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की इस हमले में मौत के पांच दिन बाद भारत की ओर से उन्हें औपचारिक तौर पर श्रद्धांजलि दी गई. भारत सरकार के इस रुख़ की काफ़ी आलोचना हुई थी.

हालांकि विदेश मंत्रालय ने कहा कि शोक पुस्तिका पांच दिनों के बाद खुली थी, इसलिए पांच मार्च को ही विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे.

भारत की विदेश नीति की सबसे ज़्यादा आलोचना हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत डेना को अमेरिकी पनडुब्बी की ओर से डुबोये जाने के बाद हुई थी. इस युद्धपोत में तक़रीबन 130 लोग सवार थे और 'डेना' नामक ये जहाज़ भारतीय नौसेना के न्योते पर एक सैन्य अभ्यास में शामिल होने के लिए भारत आया था.

ईरान के एक जहाज़ को भारत में शरण दिए जाने के सवाल पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में बयान दिया है. हालांकि उन्होंने हिंद महासागर में डुबोए गए ईरानी जहाज़ 'आईआरआईएस डेना' के बारे में कुछ नहीं कहा.

भारत के रुख़ में बदलाव की वजह

रेशमी काज़ी

धनंजय त्रिपाठी कहते हैं, "जंग के शुरुआती दिनों में ईरान को लेकर भारत की नीति बहुत अस्पष्ट थी, जबकि उसे उसी समय स्टैंड लेना चाहिए था. लेकिन शायद अमेरिका के दबाव में ऐसा नहीं हो पाया."

ईरान को लेकर भारत के रुख़ में आए बदलाव की टाइमिंग को लेकर उन्होंने कहा, "अमेरिकी प्रशासन को भी समझ में तो आ ही गया है कि वो होर्मुज़ स्ट्रेट को खुलवा नहीं सकते हैं. उन्होंने दुनिया को भरोसा दिलाया था कि जंग 72 घंटे में ख़त्म हो जाएगी, लेकिन ये हुआ नहीं. अब अमेरिका पर दुनिया भर के देशों का बहुत दबाव है कि इसे खुलवाइए क्योंकि भारत, जापान, दक्षिण कोरिया समेत कई देशों को इससे बहुत समस्या हो रही है."

उनके मुताबिक़, ऐसी स्थिति में दूसरे देश अपने हितों के लिए ईरान से बातचीत को आगे बढ़ाएंगे ही.

लेकिन ईरान युद्ध की शुरुआत में भारत की चुप्पी का बचाव करते हुए रेशमी काज़ी कहती हैं कि ऐसे मामलों में सोच-समझ कर प्रतिक्रिया देनी चाहिए और भारत ने वही किया.

उनके मुताबिक़, "हर घटना पर त्वरित प्रक्रिया नहीं देनी चाहिए और भारत ने इस मामले में सही समय पर बिलकुल सही स्टैंड लिया."

वो कहती हैं, "पीएम मोदी ने बहुत टाइमली प्रतिक्रिया दी है. ब्रिक्स की ओर से अभी तक प्रतिक्रिया नहीं आई क्योंकि हर कोई वेट एंड वॉच की स्थिति में है. तेल संकट तो बढ़ ही रहा है लेकिन अब परमाणु केंद्रों पर हमले हो रहे हैं. इससे पूरी दुनिया में बेचैनी बढ़ी है. इससे दिखने लगा है कि वैश्विक महाशक्ति के रूप में अमेरिका बाकी देशों को जो भरोसा देता था, उसमें कितनी कमी आई है. ब्रिक्स जैसे क्षेत्रीय संगठनों के लिए अब एक मौका भी बन रहा है कि वो और उभर कर आएं. देर सबेर ये स्टैंड भी लेंगे."

उनके अनुसार, 'भारत के अमेरिका और इसराइल दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं और इस युद्ध में भी भारत ने ये तो कभी नहीं कहा कि इसराइल को युद्ध करना चाहिए या ईरान को. उन्होंने तो हमेशा शांति और स्थिरता बरतने पर ज़ोर दिया.'

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.