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अली लारिजानी की मौत से गहराया ईरान में लीडरशिप का संकट
- Author, आमिर अज़ीमी
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
इसराइल के हवाई हमले में ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी की मौत ऐसे समय पर हुई है, जब वह इस्लामिक रिपब्लिक के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नीति निर्माताओं में से एक थे.
लारिजानी कोई सैन्य कमांडर नहीं थे, लेकिन ईरान के रणनीतिक फ़ैसले तय करने में उनकी अहम भूमिका थी.
सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव के तौर पर वो युद्ध, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों के केंद्र में रहते थे.
उनकी बात को सिस्टम में ख़ास महत्व दिया जाता था, ख़ासकर अमेरिका और इसराइल के साथ ईरान के टकराव को संभालने में.
28 फ़रवरी को सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की मौत के बाद लारिजानी का रुख़ काफ़ी सख़्त था और उन्होंने संकेत दिया था कि ईरान लंबे संघर्ष के लिए तैयार है.
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अब उनकी मौत, जिसकी पुष्टि सरकारी मीडिया ने कर दी है, ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही हफ़्तों के अंदर कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारी और कमांडर मारे जा चुके हैं. यह दिखाता है कि युद्ध के दौरान ईरान की नेतृत्व संरचना को कमज़ोर करने की लगातार कोशिश हो रही है.
पश्चिम के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ के बावजूद ईरान में लारिजानी को अक्सर एक व्यावहारिक नेता माना जाता था.
वो विचारधारा के प्रति वफ़ादारी और तकनीकी समझ- दोनों का संतुलन रखते थे और बयानबाज़ी के बजाय सोच-समझकर रणनीति बनाने को प्राथमिकता देते थे.
पश्चिमी देशों के साथ जुड़ने को लेकर वो संदेह में रहते थे, लेकिन इसके बावजूद वो कई अहम कूटनीतिक कोशिशों में शामिल रहे, जिनमें चीन के साथ ईरान के लंबे समय के सहयोग समझौते में दूत की भूमिका निभाना भी शामिल है.
तीन बड़े संकटों को संभाल रहे थे लारिजानी
अपनी मौत के समय अली लारिजानी तीन बड़े संकटों को संभाल रहे थे.
पहला संकट ख़ुद युद्ध था. उनका मानना था कि ईरान को लंबे संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए और लड़ाई को पूरे क्षेत्र में फैला देना चाहिए, यहां तक कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने जैसे क़दम भी उठाने चाहिए.
दूसरा संकट देश के भीतर बढ़ता असंतोष था, जो आर्थिक समस्याओं से शुरू हुआ लेकिन जल्दी ही बड़े विरोध प्रदर्शनों में बदल गया, जिनका मक़सद इस्लामिक रिपब्लिक को गिराना था. इन प्रदर्शनों पर सख़्ती से कार्रवाई की गई, जिसमें पूरे देश में हज़ारों प्रदर्शनकारियों की मौत हुई.
तीसरा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका के साथ रुकी हुई अप्रत्यक्ष बातचीत थी, जो पहले ही सैन्य हमलों की वजह से प्रभावित हो चुकी थी.
उनकी मौत के बाद ये सभी मुद्दे अब अधूरे रह गए हैं और इन्हें किसी नए उत्तराधिकारी को संभालना होगा, जो अभी तय नहीं है और बेहद नाज़ुक हालात का सामना करेगा.
हालांकि ईरान ने कुछ हद तक मज़बूती दिखाई है, खासकर वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को प्रभावित करके, लेकिन उसका हवाई क्षेत्र अब भी हमलों के लिए खुला हुआ है. ऐसे में कोई भी नया वरिष्ठ नेता तुरंत निशाने पर आ सकता है.
अब क्या हैं चुनौतियां?
इससे सत्ता का झुकाव और ज़्यादा सेना की तरफ़ जा सकता है. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के हालिया बयान से संकेत मिलता है कि अगर शीर्ष नेतृत्व काम करने की स्थिति में नहीं रहता, तो सेना की इकाइयों को व्यापक अधिकार दे दिए गए हैं.
व्यवहार में इसका मतलब यह हो सकता है कि फ़ैसले तेज़ी से लिए जाएं, लेकिन उनमें केंद्रीय स्तर पर समन्वय कम हो.
इस बात के भी संकेत हैं कि लीडरशिप उत्तराधिकार को मैनेज करने में संघर्ष कर रही है. ईरान ने सार्वजनिक घोषणाओं में देरी की है और कुछ अहम लोगों को, जिनमें नए सुप्रीम लीडर मोजतबा ख़ामेनेई भी शामिल हैं, काफ़ी हद तक सामने नहीं लाया गया है. यह सुरक्षा कारणों से है या अंदरूनी अनिश्चितता की वजह से यह साफ़ नहीं है.
कम समय में स्थिति और ज़्यादा अस्थिर हो सकती है. युद्ध में ज़्यादा आक्रामक सैन्य रुख़ और देश के भीतर और सख़्त कार्रवाई देखने को मिल सकती है.
ईरानी सेना प्रमुख आमिर हतमी ने भी लारिजानी की मौत के जवाब में "निर्णायक" कार्रवाई की धमकी दी है.
लंबे समय में अगर इस तरह वरिष्ठ नेताओं की कमी होती रही, तो सिस्टम के लिए प्रभावी तरीक़े से काम करना मुश्किल हो सकता है, ख़ासकर 9 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश में.
इसलिए अली लारिजानी की मौत का असर सिर्फ़ एक अधिकारी की कमी तक सीमित नहीं है. यह नेतृत्व संकट को और गहरा करती है, जो युद्ध की दिशा और ईरान की स्थिरता, दोनों को प्रभावित कर सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.