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क्या बीजेपी अब भी 'यूसीसी' और 'वन नेशन वन इलेक्शन' में कामयाब हो सकती है?
- Author, जुगल आर पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
4 जून को आए लोकसभा चुनाव नतीजों में बीजेपी अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा हासिल करने में नाकाम रही.
2014 (282 सीटें) और 2019 (303 सीटें) के लोकसभा चुनाव के नतीजों से उलट इस बार बहुदलीय या गठबंधन सरकार की तैयारियां शुरू हो गई हैं.
उन मुद्दों का क्या होगा जिसे बीजेपी ने साल 2014 से 2024 के बीच पुरज़ोर तरीके़ से उठाया था और उन पर अमल की दिशा में क़दम भी उठाए थे?
बीजेपी के मुख्य एजेंडे में देशभर में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करना, एक राष्ट्र एक चुनाव (ओएनओई) शामिल है.
क्या इन मुद्दों पर बीजेपी अपनी सहयोगी पार्टियों को मना सकेगी? क्या इन बदलावों को आगे बढ़ाने के लिए बीजेपी आवश्यक बहुमत जुटा सकेगी? या अगर बीजेपी इनको ठंडे बस्ते में नहीं डालती है तो उसे इन मुद्दों को थोड़ा कमज़ोर करना होगा?
क्या 4 जून को आए नतीजे मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल की योजनाओं जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली और डेटा प्रोटेक्शन से जुड़ी योजनाों के कार्यान्वयन पर भी प्रभाव डालेंगे?
इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी ने कई विशेषज्ञों और विश्लेषकों से बात की है.
समान नागरिक संहिता (यूसीसी)
समान नागरिक संहिता को लागू करना सालों से बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा रहा है. हालिया घोषणापत्र (2024) में कहा गया था, ''जब तक भारत समान नागरिक संहिता नहीं अपनाता, तब तक लैंगिक समानता नहीं हो सकती.''
हालांकि, ये साफ़ नहीं है कि बीजेपी इस दिशा में कब आगे बढ़ेगी, गृह मंत्री अमित शाह ने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई को दिए गए इंटरव्यू में 27 मई को कहा था, ''पांच साल पर्याप्त समय है.''
पार्टी की योजना को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, ''हमने उत्तराखंड में एक प्रयोग किया है, जहां हमारी बहुमत वाली सरकार है. क्योंकि ये केंद्र के साथ-साथ राज्यों से जुड़ा विषय भी है. मेरा मानना है कि समान नागरिक संहिता एक बड़ा सामाजिक, क़ानूनी और धार्मिक सुधार है.''
यूसीसी का जो विरोध कर रहे हैं उनमें राजनीतिक दल, सिविल सोसाइटी और आदिवासी समूह शामिल हैं, जिन्हें अपनी पहचान खोने का डर है.
दरअसल, पिछले साल ये ख़बर आई थी कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू ने यूसीसी के पक्ष में नहीं हैं. नीतीश और जेडीयू अब एनडीए का हिस्सा हैं.
करीब सात साल पहले नीतीश कुमार ने लॉ कमीशन प्रमुख को यूसीसी को लागू करने के तौर तरीकों के बारे में पूछा था. उन्होंने यह पत्र तब भेजा था जब लॉ कमीशन ने विभिन्न राज्य के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर यूसीसी पर उनकी राय जानने की कोशिश की थी.
तब बिहार सरकार ने प्रस्ताव को लेकर कोई भी जवाब नहीं दिया था.
चुनावी नतीजे आने के बाद जेडीयू के प्रवक्ता केसी त्यागी से जब यूसीसी पर उनकी पार्टी के स्टैंड के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "हमलोग यूसीसी के विरोध में नहीं हैं. नीतीश कुमार लॉ कमीशन के प्रमुख को इस बारे में लिख चुके हैं. इसमें सभी साझेदारों- राज्य के मुख्यमंत्रियों, विभिन्न राजनीतिक दलों, विभिन्न धर्म के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए- इससे मुद्दा सुलझ जाएगा."
बिज़नेस स्टैंडर्ड की कंसल्टिंग एडिटर अदिति फडनीस, समान नागरिक संहिता के लागू होने पर शक जाहिर करती हैं.
वो कहती हैं, ''इसके कार्यान्वन में बहुत सारी जटिलताएं हैं. एक तरफ़ आदिवासी समुदाय ख़ुश नहीं है, उन्हें ऐसा लगता है कि उनकी जीवनशैली कमज़ोर हो जाएगी. मैं जानती हूं कि पारसी समुदाय भी इन्हीं कारणों से यूसीसी नहीं चाहता है. मेरा मानना है कि आंध्र प्रदेश और बिहार जो एजेंडा तय करेंगे उसी आधार पर सरकार चलेगी.''
यहां ये बात अहम है कि सरकार ने अभी तक यूसीसी का एक भी मसौदा पेश नहीं किया है जिसे वो संसद में पारित कराना चाहती है.
हालांकि, लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य कहते हैं कि बीजेपी इस बार किसी भी 'विवादास्पद' एजेंडे को लागू करने में संघर्ष करती नज़र आएगी.
वो कहते हैं, ''हालिया परिदृश्य में विवादस्पद क़ानून को पारित कराना संभव नहीं हो सकता है. अब जबकि गठबंधन (एनडीए) के पास बहुमत है, आप कुछ क़ानून पारित कराने में सक्षम हो सकते हैं लेकिन स्थायी बदलावों के लिए ये बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है, ख़ासकर, तब जब बात संवैधानिक संशोधनों की हो.''
वहीं तेलुगू देशम पार्टी ने भी अब तक यूसीसी पर कोई स्पष्ट राय ज़ाहिर नहीं की है. पार्टी के नेताओं ने मीडिया को ये बयान ज़रूर दिया है कि राज्य में अल्पसंख्यकों के साथ कुछ नहीं होगा.
एक राष्ट्र एक चुनाव (ओएनओई)
बीजेपी का घोषणापत्र उस उच्च स्तरीय समिति की सिफ़ारिशों पर काम करने की बात करता है, जिसे सरकार ने बनाया था. वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि ये अगले पांच साल के भीतर लागू किया जाएगा.
'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में एक समिति सितंबर, 2023 में बनाई गई थी. इस समिति ने इस साल मार्च में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने का प्रस्ताव है.
चुनावी नतीजे के बाद नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइेटड के प्रवक्ता का बयान आया है कि उनकी पार्टी को वन नेशन, वन इलेक्शन के मुद्दे पर बीजेपी के साथ है.
हालांकि टीडीपी ने इस मुद्दे पर भी अपनी स्पष्ट राय ज़ाहिर नहीं की है. हालांकि टीडीपी उन 15 राजनीतिक दलों में शामिल थी, जिसने कोविंद समिति के सामने वन नेशन, वन इलेक्शन पर अपने विचार ज़ाहिर नहीं किए थे.
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने कहा है कि वो 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के विचार का कड़ा विरोध करती है और इस विचार पर काम नहीं करना चाहिए.
फडनीस कहती हैं, ''भले ही समिति ने अपना काम पूरा कर लिया है लेकिन एक विचार के तौर पर ओएनओई को ठंडे बस्ते में डालना होगा. मैं नहीं मानती हूं कि आंध्र प्रदेश या बिहार जैसे राज्य अपनी विधानसभाओं को भंग करके और फिर उन्हें 2029 में आम चुनाव के साथ कराने पर सहमत होंगे.''
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर संदीप यादव इसमें एक और नया पहलू जोड़ते हैं. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, ''देशभर में चुनाव एक साथ कराने का विचार संभावित तौर पर राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता का उल्लंघन कर सकता है. इससे सत्ता का केंद्रीकरण हो सकता है, जो भारत के संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ है, जहां राज्यों को विधायी और कार्यकारी स्वायत्तता हासिल है.''
एक राष्ट्र एक चुनाव पर काम करने वाली सरकारी समिति ने इसकी सिफ़ारिश करते हुए कहा था, ''पहले चरण में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने चाहिए. दूसरे चरण में, नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनावों को उनके साथ इस तरह से जोड़ा जाना चाहिए कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव होने के सौ दिन के भीतर उनके चुनाव हो जाएं.''
संवैधानिक क़ानून विशेषज्ञ और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का विचार थोड़ा अलग है.
वो कहते हैं, ''यूसीसी और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे क़ानूनों के भविष्य का आकलन करना जल्दबाज़ी होगी. हमें केस-टू-केस आधार पर देखना होगा. हां, संवैधानिक संशोधनों या महाभियोग प्रस्ताव के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले दो तिहाई सदस्यों के बहुमत की ज़रूरत होती है. बीजेपी की जो मौजूदा स्थिति है उसके आधार पर इसे हासिल करना मुश्किल लग सकता है."
"लेकिन जो ऐसे क़ानून होते हैं, जिन्हें साधारण बहुमत की ज़रूरत होती है, उन्हें सहजता से रखा जा सकता है. ऐसे ही कैटेगरी के क़ानूनों के लिए सदन का ज़्यादातर कामकाज होता है. उन्हें दिक्कत तब हो सकती है जब एनडीए गठबंधन एक साथ न हो. पिछली लोकसभा में कई मामलों में उन्हें एनडीए के अलावा जगन (आंध्र प्रदेश के जगनमोहन रेड्डी) और नवीन (ओडिशा के नवीन पटनायक) का भी समर्थन मिला था. उनके कुछ क़ानूनों पर इंडिया गठबंधन से जुड़ी पार्टियां भी समर्थन कर सकती हैं.''
संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन
पिछले साल सरकार ने संसद को बताया था कि परिसीमन किया जा सकता है. इसमें संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की कुल संख्या को फिर से तय करना शामिल हो सकता है. सरकार का कहना था कि परिसीमन 'साल 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद हो सकता है.'
राजनीतिक तौर पर संवेदनशील कदम होने की वजह से इस पर नज़र रहेगी.
हालांकि, आचार्य कहते हैं, ''एक बार जनगणना हो जाए तब परिसीमन आयोग का गठन करना होगा. इसे देशभर से सिफारिशें लेने में समय लगेगा. फिर, अगर आयोगों की सिफ़ारिशों को विचार-विमर्श के बाद स्वीकार किया जाना होगा, ऐसे में मुझे लगता है कि संवैधानिक संशोधन की ज़रूरत होगी. ये सब हासिल करना विपक्ष समेत दूसरी पार्टियों की सहमति के बिना कठिन काम होगा.''
1 जुलाई 2024 तक नई आपराधिक क़ानून व्यवस्था
भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023, इन तीनों क़ानूनों पर दिसंबर 2023 में राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. ये क़ानून भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़े बदलाव लाएंगे और ये 1 जुलाई 2024 से लागू हो जाएंगे.
ये तीनों क़ानून भारतीय दंड संहिता 1860, आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की जगह लेंगे.
फ़िलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि इन क़ानूनों को ठंडे बस्ते में रखा जाए.
भारत के पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने इसकी निंदा की थी. उन्होंने कहा था, ''90-99 फ़ीसदी क़ानून पुराने हैं, नए बिल में इसे कट, कॉपी, पेस्ट किया गया है.''
कुछ वकीलों ने इन क़ानूनों के प्रभाव को लेकर चिंता जताई है. वकील संजय हेगड़े ने क़ानूनों को 'नागरिक स्वतंत्रता के लिए बड़ा ख़तरा' बताया और कहा कि इस पर रोक लगनी चाहिए.
हालांकि, सरकार ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि नए क़ानून नागरिकों के लिए 'सुरक्षा के साथ-साथ न्याय भी सुनिश्चित करेंगे'.
इसी तरह, भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्टशन एक्ट, 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिल गई है लेकिन नियमों को अंतिम रूप दिया जाना बाक़ी है.
पुनर्विचार या समीक्षा
ऐसा लगता है कि पुनर्विचार या समीक्षा का दायरा अब प्रस्तावित क़ानूनों तक ही सीमित नहीं रह गया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, एनडीए की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जेडीयू अब सुरक्षा बलों में भर्ती के लिए चलाई जाने वाली अग्निवीर योजना में सुधार की मांग कर रही है.
जातिगत जनगणना कराना सिर्फ़ विपक्ष की मांग नहीं थी, जेडीयू और टीडीपी (एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी) भी इसकी मांग कर रहे थे. हालांकि, बीजेपी ने साफ़ किया कि वह इस विचार के विरोध में नहीं है, लेकिन यह देखा जाना बाक़ी है कि इस पर कैसे काम किया जाता है.
कुल मिलाकर, जो बात साफ़ है वो ये है कि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर अतीत, वर्तमान और भावी योजनाओं पर चर्चा की जाएगी. क्या वास्तव में उनमें बदलाव किए जाते हैं या नहीं देखने वाली बात होगी.
ये भी देखना होगा कि क्या इस पर दोबारा विचार होगा.
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