संसदीय बहस पर टिप्पणी का हक़ है: हेगड़े

जस्टिस हेगड़े
इमेज कैप्शन, जस्टिस हेगड़े का कहना हैं कि संसद की बहस की आलोचना भी की जा सकती है

जन लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए गठित समिति के एक सदस्य जस्टिस संतोष हेगड़े ने कहा हैं कि 'जनता सर्वोपरि है, कोई और नही.'

बैग्लौर में फ्रीडम पार्क में पहली बार सार्वजनिक रूप से बोलते हुए जस्टिस संतोष हेगड़े ने कहा कि सरकार का ये कहना बिलकुल ग़लत है कि ऐसे समय में जब कि लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया जा चुका है सिविल सोसाइटी के लोगों को उस पर टीका टिप्पणी नही करनी चाहिए.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक उन्होंने कहा कि जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन हो उस समय के लिए तो यह सिद्धांत है पर संसद की कार्रवाही के दौरान नहीं.

यहाँ तक कि ऐसे समय में भी संसद में जब किसी विधेयक पर बहस हो रही हो उस वक्त भी न केवल चर्चा की जा सकती है बल्कि बहस की आलोचना भी की जा सकती है.

हम भारत के लोग

जस्टिस संतोष हेगड़े ने सवाल किया कि क्या संसद द्वारा बनाए गए क़ानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है या नही.

उनका कहना था - 'जवाब है हाँ, न सिर्फ़ इसे चुनौती दी जा सकती है बल्कि सुप्रीम कोर्ट और यहाँ तक कि हाई कोर्ट भी उस क़ानून को असंवैधानिक करार दे सकता है. क्या इसका मतलब है कि संसद सर्वोपरि है.'

जस्टिस हेगड़े ने कहा कि सरकार को ये समझना चाहिए कि संविधान का मसौदा संविधान सभा ने तैयार ज़रूर किया था लेकिन ये भारत की जनता ही थी जिसने इसे स्वीकार किया. संविधान का पहला वाक्य ही "हम भारत के लोग" से ही शुरू होता है.

उनका कहना है कि संसद, विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के गठन के पीछे कौन है, आम जनता. इसलिए जनता सर्वोपरि है, कोई और नही.

महत्वपूर्ण है कि सरकारी विधेयक और जन लोकपाल के समर्थकों के बीच जारी रस्साकशी के दौरान बहस का मुद्दा ये भी है कि संसद और जनता में श्रेष्ठ कौन है ?

सरकार यह कह कर अन्ना के आंदोलन की आलोचना करती आ रही है कि क़ानून बनाने का अधिकार संसद को है और किसी एक व्यक्ति की इच्छा को थोपा नही जा सकता.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी संसद में कहा था कि देश में सभी को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन अन्ना ने जो रास्ता चुना है, वो उचित नहीं है और ये संसदीय लोकतंत्र के लिए नुक़सानदेह साबित हो सकता है.